एक तरफ जहां कुछ देशों ने इस खाई को कम करने की दिशा में थोड़ी-बहुत प्रगति की है, वहीं पाकिस्तान में हालात जस के तस हैं। सामाजिक परंपराएं, आर्थिक ढाँचा और संस्थागत कारक इस भेदभाव को और मजबूत करते हैं।
ज्यादातर पाकिस्तानी महिलाएं खेतों में मजदूरी और घरों में कामकाज जैसे कम तनख्वाह वाले अनौपचारिक कामों में लगी रहती हैं। यहां उन्हें न तो कानूनी सुरक्षा मिलती है और न ही पक्के रोजगार और लाभ की सुविधा।
आईएलओ की रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि औपचारिक क्षेत्रों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्त और उद्योगों में भी महिलाएं पुरुषों से कम ही वेतन पाती हैं। ऊंचे पदों तक पहुंचने में तो अंतर और ज्यादा बढ़ जाता है। इसे ही “ग्लास सीलिंग” कहा जाता है। इसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है क्योंकि आधी आबादी की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
इस असमानता की जड़ें केवल अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक और सामाजिक सोच में भी छिपी हैं। समाज में अब भी यह मान्यता है कि घर और बच्चों की जिम्मेदारी महिलाओं की है, जिससे वे पूरा समय नौकरी नहीं कर पातीं। ग्रामीण और परंपरागत इलाकों में सुरक्षा और आवाजाही की दिक्कतें भी उनके रोजगार के रास्ते रोकती हैं।
शिक्षा व्यवस्था भी महिलाओं को आधुनिक और बेहतर तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए तैयार नहीं कर पाती। इसके अलावा, सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में भर्ती और प्रमोशन के दौरान पूर्वाग्रह महिलाओं के खिलाफ ही काम करते हैं।
आईएलओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने पिछले कुछ वर्षों में कुछ लैंगिक-संवेदनशील नीतियाँ लागू की हैं, जिनमें मातृत्व अवकाश प्रावधान, उत्पीड़न-विरोधी कानून और सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार में महिलाओं के लिए कोटा शामिल हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया के देशों में लिंग असमानता एक आम समस्या है, लेकिन पाकिस्तान की स्थिति सबसे खराब है। यह देश वैश्विक लैंगिक समानता सूचकांकों में लगातार निचले पायदान पर है।



