राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को महाराष्ट्र के नागपुर में विजयादशमी के अवसर पर अपने संबोधन में आत्म-जागरूकता, स्वदेशी, सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सहेजते हुए वर्तमान चुनौतियों का सामना करना होगा।
भागवत ने संघ के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में चलाए गए जनसंपर्क अभियान का उल्लेख करते हुए बताया कि इसके तहत देशभर के 4,61,527 गांवों और 41,076 शहरी बस्तियों तक पहुंच बनाई गई। उनके अनुसार, अभियान के माध्यम से लगभग 10.20 करोड़ घरों और परिवारों से संपर्क किया गया। विभिन्न जिलों में आयोजित 1,117 कार्यक्रमों में 4,26,497 लोगों ने भाग लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये शुरुआती आंकड़े हैं और अंतिम रिपोर्ट बाद में प्रस्तुत की जाएगी।
सामाजिक एकता पर जोर देते हुए भागवत ने कहा कि भाषा, जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारतीय समाज में व्यापक राष्ट्रीय जुड़ाव की भावना मजबूत रहनी चाहिए। उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ को स्थायी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया बताते हुए परिवार में जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक अनुशासन और स्वदेशी अपनाने जैसे विषयों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की अपील की।
भागवत ने युवाओं में नशीले पदार्थों की बढ़ती समस्या पर चिंता जताई और बच्चों को सही दिशा देने में माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण बताई। उन्होंने तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल तथा डिजिटल सामग्री के नियमन पर भी विचार करने की आवश्यकता बताई।
नेपाल में आई आपदा और कोलकाता की हालिया त्रासदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने असंतुलित विकास, पर्यावरणीय अस्थिरता, भीड़भाड़ और लापरवाही पर सवाल उठाए। भागवत ने कहा कि भारत को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर दुनिया के सामने एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए।
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