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Friday, August 14, 2026
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मानसून सत्र का समापन, राज्यसभा के सभापति ने हंगामे और व्यवधान पर जताई चिंता!

उन्होंने कहा कि पूरे सत्र के दौरान बार-बार हुए व्यवधान के कारण सदन का कामकाज प्रभावित हुआ और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक चर्चा के लिए उपलब्ध समय का भी नुकसान हुआ।

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गुरुवार को संसद के मानसून सत्र का समापन हो गया। पूरे सत्र में सदन की कार्यवाही केवल 37 घंटे से कुछ अधिक देर तक चली। सदन की उत्पादकता भी 39 प्रतिशत के आसपास रही। राज्यसभा के 271वें सत्र के समापन पर सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन की कार्यवाही का ब्यौरा पेश किया और लगातार हंगामे तथा व्यवधान पर गहरी चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि पूरे सत्र के दौरान बार-बार हुए व्यवधान के कारण सदन का कामकाज प्रभावित हुआ और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक चर्चा के लिए उपलब्ध समय का भी नुकसान हुआ। हालांकि इन सबके बीच सदन ने कई विधेयकों पर विचार कर उन्हें पारित किया या वापस लौटाया। सभापति ने कहा, ”यह खेद का विषय है कि यह सत्र लगातार अव्यवस्था और बार-बार होने वाले व्यवधान से प्रभावित रहा, जिसके कारण सदन का कामकाज कई बार पटरी से उतर गया।”

सभापति ने कहा कि इन व्यवधानों के बावजूद राज्यसभा ने अपने मूल विधायी दायित्वों को पूरा किया। सदन ने 12 विधेयकों पर विचार किया और उन्हें पारित किया या विधायी कार्यवाही के अंतर्गत वापस लौटाया। उन्होंने कहा कि यदि सभी सदस्य सामूहिक रूप से कार्यवाही में हिस्सा लेते, अपने महत्वपूर्ण सुझाव देते और सार्थक चर्चा में भाग लेते, तो सत्र की तस्वीर निश्चित रूप से अलग होती।

सभापति सीपी राधाकृष्णन ने बताया कि राज्यसभा की कार्यवाही इस सत्र में केवल 37 घंटे 49 मिनट चली। सदन की उत्पादकता 39.17 प्रतिशत रही। उन्होंने कहा कि सदस्यों के पास जनहित और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को उठाने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध थे।

सदस्यों को 285 तारांकित प्रश्न, 380 शून्यकाल के विषय और 380 विशेष उल्लेख उठाने का अवसर मिला था। हालांकि, इनमें से केवल 16 प्रश्न, 52 शून्यकाल के विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके।

सभापति ने कहा कि सदन का मंच सदस्यों के लिए खुला था, लेकिन उपलब्ध अवसरों का उस तरह पूरा इस्तेमाल नहीं किया जा सका, जैसा कि जनता की आवाज को सदन में प्रभावी ढंग से उठाने के लिए किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा, ”हमारे पास अवसर उपलब्ध था, लेकिन जिन लोगों का हम प्रतिनिधित्व करते हैं, उनकी आवाज उठाने के लिए उपलब्ध अवसरों का हम पूरी तरह उपयोग नहीं कर सके।”

राज्यसभा के सभापति ने कहा कि वरिष्ठ सदन होने के नाते उच्च सदन की एक विशिष्ट जिम्मेदारी है। इसे तर्कपूर्ण बहस, गरिमापूर्ण असहमति और विचारपूर्ण कानून निर्माण की परंपरा को बनाए रखना चाहिए। लगातार होने वाले व्यवधानों का असर अंतत जनता के विश्वास और उसकी आकांक्षाओं पर पड़ता है। इसलिए सभी सदस्यों को संसदीय आचरण के उच्चतम मानकों को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा, ”हमें संसदीय आचरण के उच्चतम मानकों को बनाए रखने और इस संस्था की गरिमा एवं पवित्रता को संरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए।” सभापति ने इस सत्र की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में नवनिर्वाचित और मनोनीत सदस्यों के लिए आयोजित ओरिएंटेशन कार्यक्रम का भी उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि दो दिवसीय इस कार्यक्रम में सदस्यों को संसदीय कार्यप्रणाली, प्रक्रिया और सदस्यों से अपेक्षित आचरण के मानकों की जानकारी दी गई। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ मंत्री और अनुभवी सांसदों ने अपने संसदीय अनुभव तथा व्यावहारिक जानकारी साझा की।

सभापति ने कहा कि कार्यक्रम में वरिष्ठ सांसदों के अनुभव से नए सदस्यों को संसदीय कार्यवाही को समझने में महत्वपूर्ण मदद मिली। उन्होंने बताया कि सत्र के दौरान अपनी व्यस्तताओं और अपने-अपने राज्यों की जिम्मेदारियों के बावजूद 35 सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हुए और इससे लाभ उठाया।

ऐसे कार्यक्रम नए सदस्यों को संसद की कार्यप्रणाली समझने के साथ-साथ संसदीय परंपराओं, प्रक्रियाओं और सदन में अपेक्षित आचरण से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सत्र के समापन पर, सभापति ने सदस्यों से अपील की कि भविष्य में सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में सभी सदस्य सहयोग करें। उन्होंने कहा कि संसद में असहमति लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन असहमति को सार्थक बहस और गरिमापूर्ण तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए।

राज्यसभा की जिम्मेदारी केवल विधेयकों को पारित करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर गंभीर, विचारपूर्ण और सार्थक चर्चा करना भी है। लगातार व्यवधान से न केवल सदन का समय प्रभावित होता है, बल्कि जनता के उन मुद्दों पर भी चर्चा नहीं हो पाती, जिन्हें लेकर सांसद सदन में आते हैं।
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