मिडिल ईस्ट के सबसे सेंसिटिव माने जाने वाले इज़राइल (Israel Elections 2026) के पॉलिटिकल सीन पर एक बार फिर बड़ा तूफ़ान आ गया है। 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनावों के मद्देनज़र, इज़राइल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने दो बड़ी अरब पार्टियों और उनके फ्रंट लीडर्स को चुनाव लड़ने से बैन करने का एक बहुत ही बडा फ़ैसला लिया है। इस फ़ैसले ने इज़राइल में मुस्लिम और अरब कम्युनिटी के पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन पर सवाल खड़े कर दिए हैं, और पॉलिटिकल सर्कल में यह आरोप लगाया जा रहा है कि यह फ़ैसला प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की चुनाव जीतने की एक बड़ी चाल है।
23 सितंबर को लिए गए इस फ़ैसले में, सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने मंसूर अब्बास की लीडरशिप वाले पॉलिटिकल अलायंस ‘रा’म’ और हदाश, ता’अल और बलाद वाली ‘जॉइंट लिस्ट’ को चुनावी मैदान से बाहर करने के लिए वोट किया। इसके अलावा, हदाश MP ओफ़र कासिफ़ और बलाद पार्टी लीडर सामी अबू शहदेह की इंडिविजुअल कैंडिडेसी पर भी बैन लगा दिया गया है। लेकिन, इज़राइली चुनावी कानून के मुताबिक, इस फैसले को आखिरी नहीं माना जाता, क्योंकि ऐसे बैन के लिए सुप्रीम कोर्ट की आखिरी मंज़ूरी ज़रूरी है।
यह कार्रवाई किस आधार पर की गई?
इज़राइली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने बेसिक लॉ: नेसेट के आर्टिकल 7a के तहत यह डिसक्वालिफ़िकेशन कार्रवाई की। इस कानून के नियमों के मुताबिक, अगर कोई पार्टी या उम्मीदवार इज़राइल को यहूदी और डेमोक्रेटिक देश मानने से इनकार करता है, समाज में नस्ली या जातीय नफ़रत फैलाता है, या किसी दुश्मन देश या आतंकवादी संगठन द्वारा इज़राइल के ख़िलाफ़ हथियारबंद लड़ाई का समर्थन करता है, तो उसे चुनाव से डिसक्वालिफ़ाई किया जा सकता है।
रा’म पार्टी के ख़िलाफ़ पिटीशन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी, दक्षिणपंथी ओत्ज़मा येहुदित पार्टी और एक सोशल संगठन ने मिलकर फ़ाइल की थी। कमेटी ने 18 से 5 के साफ़ बहुमत से रा’म को डिसक्वालिफ़ाई किया। दूसरी ओर, लिकुड पार्टी ने भी जॉइंट लिस्ट के ख़िलाफ़ पहल की थी। बलाद लीडर सामी अबू शेहादेह पर बैन लगाने का प्रस्ताव 31 से 4 के बड़े अंतर से मंज़ूर हो गया। यह फ़ैसला उनके 8 अक्टूबर, 2023 को लिखे एक आर्टिकल पर आधारित था, जिसमें उन्होंने इज़राइल की पॉलिसियों की आलोचना की थी। हालाँकि, अबू शेहादेह ने अपने ऊपर लगे हिंसा और आतंकवाद को सपोर्ट करने के सभी आरोपों को पूरी तरह से नकार दिया है।
नेतन्याहू की पॉलिटिकल चालें और बदलते समीकरण
इस फ़ैसले का इज़राइली पॉलिटिक्स पर, और खासकर अरब वोटर्स की भूमिका पर, दूरगामी असर पड़ने की संभावना है। 2021 के चुनावों में, मंसूर अब्बास की रा’म पार्टी ने नफ़्ताली बेनेट और याइर लैपिड की मिली-जुली सरकार को सपोर्ट करके इतिहास रच दिया था। इस फ़ैसले ने बेंजामिन नेतन्याहू के 12 साल के राज को खत्म कर दिया था। इसीलिए नेतन्याहू की लिकुड पार्टी किसी भी हालत में अरब पार्टियों को किंगमेकर की भूमिका में वापस आने देने के मूड में नहीं है।
अगर चैनल 12 के हाल ही में जारी किए गए लेटेस्ट पोल को देखें, तो जॉइंट लिस्ट को 7 सीटें और रा’म पार्टी को 5 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि नेतन्याहू के मौजूदा गठबंधन को 50 सीटें मिलने की संभावना है। ऐसे में, अगर अरब पार्टियों को चुनावों से पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है, तो इस बात को लेकर बहुत अनिश्चितता है कि उनकी 12 सीटों से सीधे तौर पर किसे फायदा होगा। चूंकि अरब सपोर्ट को लेकर विपक्षी पार्टियों के बीच पहले से ही बड़े मतभेद हैं, इसलिए एनालिस्ट का मानना है कि इस बैन से नेतन्याहू को इनडायरेक्टली फायदा होने की संभावना ज़्यादा है।
सुप्रीम कोर्ट का आखिरी फैसला निर्णायक होगा
इज़राइल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी में मुख्य रूप से राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए इसके फैसलों पर अक्सर राजनीति से प्रेरित होने का आरोप लगता है। अब यह पूरा विवाद इज़राइल के सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, और इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होनी है।
सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि पार्टियों और उम्मीदवारों के खिलाफ आरोप कानूनी हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही अरब पार्टियों और उनके नेताओं पर इलेक्शन कमीशन द्वारा लगाए गए ऐसे बैन को रद्द करके राहत दे चुका है। इसलिए, इन अरब पार्टियों और उनके नेताओं के नाम 27 अक्टूबर को बैलेट पेपर पर होंगे या नहीं, इसका आखिरी फैसला अब सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है।
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