पाहलगाम आतंकी हमले पर किए गए सोशल मीडिया पोस्ट और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी के मामले में भोजपुरी लोकगायिका नेहा सिंह राठौर को राहत नहीं मिल पाई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 5 दिसंबर को उनकी एंटिसिपेटरी बेल याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि उनकी पोस्ट ऐसे समय में की गईं जब देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा खतरा था।
जस्टिस बृज राज सिंह की पीठ ने कहा कि राठौर द्वारा X पर किए गए पोस्ट प्रधानमंत्री के खिलाफ निर्देशित थे और इनमें उनके नाम का अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल किया गया। अदालत ने यह स्वीकार किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मूल अधिकार है, लेकिन यह अधिकार,“सार्वजनिक व्यवस्था और शालीनता बनाए रखने की सीमाओं के अधीन है।”
पीठ ने कहा कि राठौर ने ये टिप्पणी ठीक उसी समय की जब 22 अप्रैल के पाहलगाम आतंकी हमले के बाद देश सदमे में था और सुरक्षा बल उच्च सतर्कता पर थे। इसलिए यह मुद्दा केवल अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और संवेदनशीलता का भी है।
जम्मू-कश्मीर के पाहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की मौत के बाद नेहा राठौर ने सोशल मीडिया पर कई पोस्ट किए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री की बिहार यात्रा राष्ट्रवाद के नाम पर वोट बटोरने का प्रयास है और सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है। उन्होंने लिखा कि सत्ता पक्ष देश को युद्ध की ओर धकेल रहा है, बजाय इसके कि हमलावरों की तलाश की जाए या अपनी गलतियों को स्वीकार किया जाए।
अधिकारियों ने इन पोस्टों को राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध बताया और कहा कि इनके कारण धार्मिक तथा जातीय तनाव भड़कने की आशंका थी। राज्य ने यह भी दावा किया कि राठौर की पोस्ट पाकिस्तान तक पहुंचीं और वहां भारत-विरोधी नैरेटिव को हवा देने में इस्तेमाल की गईं। राठौर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्णेंदु चक्रवर्ती ने दलील दी कि उनकी पोस्ट सरकार की नीतियों पर असहमति दर्शाती हैं, जो संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आलोचना और असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
इसके विपरीत, सरकारी वकीलों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही उनकी याचिका खारिज कर चुका है और उन्हें निचली अदालत में चार्ज-फ्रेमिंग के चरण पर दलील देने को कहा गया है। राज्य ने यह भी कहा कि राठौर पुलिस जांच से जानबूझकर बच रही थीं और उनका मकसद “सम्प्रदायिक तनाव पैदा करना और प्रधानमंत्री तथा बीजेपी की छवि को नुकसान पहुँचाना” था।
14 पन्नों के आदेश में कोर्ट ने राठौर की पोस्ट की भाषा की आलोचना करते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री के प्रति असम्मानजनक थी और अत्यधिक संवेदनशील समय में की गई थी। कोर्ट ने उनकी याचिका की तकनीकी वैधता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले सेशन कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए था। इस प्रकार, अदालत ने यह मानते हुए कि मामला गंभीर है और जांच प्रभावित हो सकती है, जमानत अर्जी खारिज कर दी।
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