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Monday, January 19, 2026
होमन्यूज़ अपडेट'जावेद अख़्तर मराठी में बात करता है क्या?'

‘जावेद अख़्तर मराठी में बात करता है क्या?’

हिंदुओं पर हमला करने वालों को दी चेतावनी

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मीरा रोड में भाषा के मुद्दे पर एक रेस्तरां मालिक को पीटने की घटना के बाद महाराष्ट्र के मंत्री और बीजेपी नेता नितेश राणे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उन्हें इतनी ही हिम्मत है, तो नल बाजार और मोहम्मद अली रोड जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में जाकर दिखाएं कि वहां के लोग मराठी में बात करते हैं या नहीं।

नितेश राणे ने मीडिया से बात करते हुए तीखे शब्दों में कहा , “हिंदू को मारा गया है, इतनी हिम्मत जाकर नल बाज़ार और मोहम्मद अली रोड पर जाकर दिखाओ ना। वो गोल टोपी और दाढ़ी वाले क्या मराठी में बात करते हैं क्या? शुद्ध मराठी में बात करते हैं क्या? उनको कान के नीचे बजाने की हिम्मत नहीं है। जावेद अख्तर क्या मराठी में बात करता है क्या? आमिर ख़ान क्या मराठी में गाता है क्या? उसके मुँह से मराठी निकालने की हिम्मत नहीं है। ये ग़रीब हिंदू को क्यों मारने की हिम्मत करते हो? ये सरकार हिंदू ने बिठाई है। हिंदुत्व विचार की सरकार है। इसलिए इस तरह की कोई भी हिम्मत करेगा तो हमारी सरकार भी तीसरी आँख खोलेगी।”

उनकी इस तीखी टिप्पणी के बाद राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है। यह बयान उस घटना के बाद आया है जिसमें मीरा रोड स्थित एक होटल के मालिक को केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने मराठी में जवाब नहीं दिया। बताया जा रहा है कि तीन मनसे कार्यकर्ताओं ने रेस्तरां में घुसकर उसके साथ अभद्रता की और कई बार थप्पड़ मारे। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद लोगों में रोष फैल गया।

घटना के विरोध में मीरा रोड के स्थानीय लोग रेस्तरां मालिक के समर्थन में सामने आए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। क्षेत्र के कई दुकानों और होटलों ने गुरुवार (3 जुलाई) को विरोध स्वरूप अपने प्रतिष्ठान बंद रखे।

इस बीच, राणे का बयान सीधे तौर पर भाषाई असहिष्णुता के खिलाफ और हिंदू पीड़ितों के समर्थन में देखा जा रहा है। उन्होंने इस मुद्दे को सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जोड़ते हुए यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की मौजूदा सरकार हिंदुत्व के विचार पर आधारित है और अगर कोई हिंदुओं पर अत्याचार करने की कोशिश करेगा, तो सरकार “तीसरी आंख खोलने में देर नहीं करेगी।”

इस विवाद से यह साफ है कि महाराष्ट्र में भाषा के नाम पर हिंसा और जबरन मराठी थोपने की घटनाएं एक सांप्रदायिक और राजनीतिक बहस का रूप लेती जा रही हैं। जहां एक ओर मराठी भाषा और पहचान की रक्षा की बात होती है, वहीं दूसरी ओर इसके नाम पर विशेष समुदायों या वर्गों पर हिंसा की घटनाएं लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सवाल उठाती हैं।

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