उन्होंने कहा, “मुझे लंबे समय से गले की समस्या थी। पीएम मोदी ने देखा कि मैं बैठकों के दौरान बार-बार पानी पीता हूं। कई बार उन्होंने मुझे गुनगुना पानी पीने की सलाह दी और यहां तक कि सुनिश्चित किया कि बैठकों में मेरे लिए गुनगुना पानी उपलब्ध कराया जाए। यह कितना विचारशील संकेत था।
पीयूष गोयल ने कहा कि अचानक पीएम मोदी ने बीच में रोककर पूछा, “पीयूष, क्या तुम अपने गले का इलाज कराना चाहते हो?” मैंने कहा, “हां।” उन्होंने दोबारा पूछा, “क्या तुम वह करोगे जो मैं कहूं?” मैंने फिर कहा, “हां।” तब उन्होंने मुझे योग चिकित्सा अपनाने की सलाह दी। मैंने बिना हिचकिचाए उनकी बात मान ली और बैठक आगे बढ़ी।
उन्होंने आगे कहा कि मैं स्तब्ध रह गया। सलाह देना एक बात है, लेकिन स्वयं मदद की व्यवस्था करना बिल्कुल अलग। मैंने योग विशेषज्ञ को लाने के लिए वाहन भेजने का प्रस्ताव दिया, लेकिन मुझे बताया गया कि इसकी जरूरत नहीं है, प्रधानमंत्री ने पहले से सारी व्यवस्था कर दी है।
वहीं, केंद्रीय मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने ‘एक्स’ हैंडल पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा, “हैशटैग मायमोदीस्टोरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक खासियत यह है कि वे साधारण से साधारण चीजों में भी असाधारण संभावनाएं देख लेते हैं। जहां हममें से ज्यादातर लोग रोजमर्रा की जिंदगी में छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं, वहीं वे उनमें सामाजिक बदलाव का एक अवसर तलाश लेते हैं। सांसदों के साथ उनकी एक बैठक के दौरान मैंने खुद इसका अनुभव किया।
उन्होंने कहा कि उस दिन पीएम मोदी ने हमसे पत्रिकाओं और किताबों जैसी साधारण चीजों के बारे में बात की। उन्होंने कहा, “आप सभी अपने लिए पत्रिकाएं और अखबार मंगवाते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद अक्सर वे बेकार पड़े रहते हैं। तो क्यों न इन्हें एक संसाधन में बदल दिया जाए? अपने दफ्तर में एक छोटी सी लाइब्रेरी बनाएं।
सतीश चंद्र दुबे ने कहा कि मैं यह देखकर दंग रह गया कि कैसे इतना साधारण सुझाव जमीनी स्तर पर साक्षरता और जागरूकता को प्रेरित कर सकता है। फिर उन्होंने एक और उदाहरण दिया, इस बार दवाओं के बारे में। प्रधानमंत्री ने कहा, “अक्सर जब आप 10 गोलियों के पैक में से 4-5 गोलियां खाकर ठीक हो जाते हैं तो बाकी दवाइयां फेंक देते हैं।
उन्होंने कहा कि उस दिन पीएम मोदी की बातें सुनकर मुझे एहसास हुआ कि वे रोजमर्रा के मुद्दों पर कितनी गहराई से सोचते हैं। सिर्फ नीतियों और बड़ी परियोजनाओं के स्तर पर ही नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी आदतों के स्तर पर भी जो लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। उनकी दृष्टि हमेशा व्यावहारिक, रचनात्मक और आम लोगों के जीवन की समझ पर आधारित होती है।
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