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‘मैकॉले की गुलामी से भारत को मुक्त करें’: पीएम मोदी ने पेश किया 10 साल का राष्ट्रीय रोडमैप

शिक्षा और मानसिकता में बड़े बदलाव का आह्वान

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (18 नवंबर) को देश से मैकॉले द्वारा थोपे गए गुलामी के मानसिक ढांचे से स्वयं को मुक्त करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आने वाले 10 वर्ष भारत के लिए निर्णायक होंगे, क्योंकि 1835 में लागू मैकॉले शिक्षा प्रणाली के 200 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। एक ऐसा कालखंड जिसने भारतीय समाज, शिक्षा और आत्मविश्वास पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

पीएम मोदी छठे रामनाथ गोयंका लेक्चर को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने कहा कि “थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने 1835 में भारतीय शिक्षा ढांचे की रीढ़ तोड़ने का अभियान चलाया, जिससे पारंपरिक ज्ञान, भारतीय भाषाओं और स्वदेशी मूल्यों को हाशिये पर धकेल दिया गया।” प्रधानमंत्री ने कहा, “1835 में मैकॉले ने घोषणा की थी कि वह ऐसे भारतीय तैयार करेगा जो दिखने में भारतीय हों पर सोच ब्रिटिश जैसी हो। इसी सोच ने हमारे आत्मविश्वास को तोड़ा और हमें हीनभावना से भर दिया।”

उन्होंने कहा कि इस शिक्षा प्रणाली ने भारतीय जीवनशैली, ज्ञान परंपरा और स्थानीय भाषाओं को कमजोर किया।
पीएम के अनुसार, “आजादी के बाद भी यह हीनभावना जारी रही और भारत धीरे-धीरे विदेशी विचारों, विदेशी मॉडल और विदेशी मानकों पर निर्भर होता गया।” मोदी ने कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली विद्या और कौशल दोनों को समान महत्व देती थी, लेकिन मैकॉले की नीति ने इसे ध्वस्त कर दिया।

उन्होंने कहा,“महात्मा गांधी ने जिस स्वदेशी दर्शन को स्वतंत्रता आंदोलन की आधारशिला बनाया, आजादी के बाद वह भी उपेक्षित हो गया। हमने नवाचार और शासन के मॉडल विदेशों में खोजने शुरू कर दिए।” इस मानसिकता के कारण, उनके अनुसार, “आयातित विचारों, वस्तुओं और सेवाओं को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ी।”

पीएम मोदी ने कहा कि हर देश अपनी ऐतिहासिक धरोहर पर गर्व करता है, लेकिन भारत में स्वतंत्रता के बाद अपनी विरासत को नकारने का प्रयास हुआ। उन्होंने कहा, “बिना गर्व के संरक्षण नहीं होता, और बिना संरक्षण विरासत सिर्फ ईंट-पत्थर के खंडहर बनकर रह जाती है।”

स्थानीय भाषाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने पूछा कि कौन सा देश अपनी ही भाषाओं को अपमानित करता है?
उन्होंने कहा कि जापान, चीन और दक्षिण कोरिया ने कई पश्चिमी प्रथाएं अपनाईं, लेकिन अपनी मातृभाषा से समझौता नहीं किया। इसी कारण नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में स्थानीय भाषाओं में शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार अंग्रेजी के विरोध में नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं के सम्मान और उपयोग को बढ़ावा देना चाहती है। उन्होंने कहा कि मैकॉले की नीतियों ने भारत में यह भ्रांति बो दी कि महानता और प्रगति सिर्फ विदेशी तरीकों से ही संभव है, और यही सोच दशकों तक मजबूत होती रही। पीएम मोदी ने देश से आग्रह किया,“अगले 10 वर्ष में हमें संकल्प लेना होगा कि मैकॉले द्वारा थोपे गए गुलामी के मानसिक ढांचे से मुक्त होना है। आने वाले साल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को शिक्षा, अर्थव्यवस्था, नवाचार और सामाजिक व्यवस्था में अपनी स्वदेशी जड़ों को पुनर्जीवित करना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि मैकॉले द्वारा पैदा की गई मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकृतियों को आने वाले दशक में मिटाना आवश्यक है।

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