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पुरस्कार राशि नकारने वाली, “गीता प्रेस गांधी शांति अवॉर्ड की हकदार”         

पीएम मोदी ने गीता प्रेस के शताब्दी के समापन समारोह में शामिल हुए। उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि गीता प्रेस संस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है। 

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पीएम मोदी ने शुक्रवार को गीता प्रेस के शताब्दी के समापन समारोह में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि गीता प्रेस एक संस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत आस्था है। वह इस रूप में दुनिया की एकमात्र इकलौती प्रेस है। गीता प्रेस करोड़ों लोगों के लिए एक मंदिर के रूप में जानी जाती है। उसके नाम और काम दोनों गीता की ही तरह है। इतना ही नहीं, पीएम मोदी ने कहा कि गीता प्रेस हिन्दू धर्म की किताबों को प्रिंट करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी पब्लिशर है।
बता दें कि, हाल ही में केंद्र सरकार ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया है। जिसमें एक करोड़ की राशि,एक प्रशस्ति पत्र और एक पट्टिका, हस्तकला या उत्पाद दिया जाना है।  हालांकि गीता प्रेस ने एक करोड़ को राशि लेने से मना कर दिया है और सम्मान पत्र स्वीकारने की बात कही है।गौरतलब है कि जिस निर्णायक मंडली ने गीता प्रेस को पुरस्कार के लिए चुना था, उसकी पीएम नरेंद्र मोदी अध्यक्षता कर रहे थे।

 गीता प्रेस के कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा कि जहां गीता होती है वहां श्री कृष्ण भी होते हैं। वैसे ही जहां कृष्ण होते हैं वहां करुणा और कर्म होता है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस संतों की कर्मस्थली के तौर पर जानी जाती है। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने पर पीएम नरेंद्र मोदी  ने इसे जायज ठहराया। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस इसकी हकदार है। गीता प्रेस कार्यालय कम मंदिर के समान ज्यादा है।
  उन्होंने कहा कि गीता प्रेस की शताब्दी  समारोह में शामिल होना हमारा सौभाग्य है। गीता प्रेस धर्म, कर्म और आस्था से ही नहीं जुडी बल्कि ये राष्ट्रीय चरित्र वाली है और भारत को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इतना ही नहीं, गीता प्रेस आध्यात्मिक अलख जगाई है जिसकी रोशनी मानवता का मार्गदर्शन कर रही है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि अगर आपका उद्देश्य और मूल्य पवित्र हैं तो आपको सफलता जरूर मिलेगी। वहीं, इस मौके पर पीएम मोदी ने शिवपुराण ग्रंथ का विमोचन किया। यहां उन्होंने गीता प्रेस के इतिहास को भी याद किया। उन्होंने कहा कि हमारे पुस्तकालयों को विदेशी आक्रांताओं को जलाये। फिर अंग्रेजों ने हमारे गुरुकुलों को समाप्त किया। उन्होंने कहा कि आप सोचिये बिना गीता और रामायण के हमारा समाज कैसा होगा।
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