नेपाल में हाल ही में हुए चुनावों के शुरुआती नतीजों में युवाओं के समर्थन से उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने बढ़त बनानी शुरू कर दी है। पिछले वर्ष हुए जनआंदोलन के बाद पहली बार हो रहे इन चुनावों को देश की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। प्रारंभिक रुझानों के अनुसार, युवाओं से प्रेरित इस नए राजनीतिक दल ने कई सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी भी वापसी की कोशिश कर रही है।
चुनावों में RSP के स्टार उम्मीदवार और चर्चित रैपर बालेन्द्र शाह एक सीट पर आगे चल रहे हैं और अब तक एक सीट जीत चुके हैं। वहीं शुरुआती रुझानों के मुताबिक नेपाली कांग्रेस 46 विधानसभा सीटों में से पांच सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।
उधर, केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (CPN) तीन सीटों पर आगे चल रही है, जबकि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी एक सीट पर बढ़त बनाए हुए है। नेपाल में इस चुनाव में लगभग 60 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष हुए जनआंदोलन के बाद पहला बड़ा लोकतांत्रिक अभ्यास है।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने काठमांडू-1 निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल करने का दावा किया है। पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य आर.के. धुंगाना के अनुसार, पार्टी की उम्मीदवार रंजू दर्शना ने बडे अंतर से जीत दर्ज की है। धुंगाना ने बताया कि रंजू दर्शना को 10,000 से अधिक वोट मिले, जो उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार प्रबल थापा छेत्री से लगभग दोगुने हैं। हालांकि, निर्वाचन आयोग की ओर से इस परिणाम की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
कुछ और परिणाम शुक्रवार(6 मार्च) देर तक सामने आने की उम्मीद है, लेकिन पूरे देश के अंतिम नतीजे आने में कई दिन लग सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना कम है, ऐसे में सरकार गठन के लिए दलों के बीच बातचीत और गठबंधन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
अंतरिम प्रधानमंत्री सुषिला कार्की ने चुनाव प्रक्रिया की शांतिपूर्ण समाप्ति की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह मतदान देश के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
बता दें सितंबर 2025 में हुए बड़े जनआंदोलन के बाद से नेपाल में अंतरिम सरकार काम कर रही है। उस आंदोलन में कम से कम 77 लोगों की मौत हुई थी और संसद समेत कई सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया था।
युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन पहले सोशल मीडिया पर लगाए गए एक अल्पकालिक प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ था, लेकिन बाद में यह भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ व्यापक असंतोष में बदल गया। अब इन चुनावों को उसी आंदोलन के बाद नई राजनीतिक दिशा तय करने के तौर पर देखा जा रहा है।
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