तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की वार्षिक बैठक के दौरान सदस्य देशों ने आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया। बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।
भारत सहित सभी सदस्य देशों ने इस बात पर जोर दिया कि आपसी मतभेदों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाना ही स्थिरता और शांति का मार्ग है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज की दुनिया अनेक चुनौतियों से जूझ रही है, जिनमें वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानताएं शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए सदस्य देशों के बीच पारस्परिक विश्वास और सहयोग बेहद जरूरी है।
मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि एससीओ केवल एक संगठन नहीं बल्कि साझा संस्कृति, इतिहास और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी संगठन के महत्व पर बल देते हुए कहा कि सभी देशों को बहुपक्षवाद की राह पर चलना चाहिए और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जिम्मेदारी साझा करनी होगी। उन्होंने भारत और चीन जैसे बड़े देशों की भूमिका को निर्णायक बताया।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया, वहीं मध्य एशियाई देशों ने आपसी कनेक्टिविटी और निवेश को बढ़ावा देने की आवश्यकता जताई।
बैठक के अंत में सभी सदस्य देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि आने वाले समय में एससीओ को और प्रभावी, समावेशी और परिणामोन्मुख बनाया जाएगा। साझा वक्तव्य में कहा गया कि संगठन पारस्परिक सम्मान, समानता और सहयोग की भावना से आगे बढ़ते हुए एशिया और विश्व की शांति एवं समृद्धि में योगदान देगा।
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