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तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी: सचिन पायलट की चुप्पी का क्या है संदेश? 

गहलोत कैम्प के 76 विधायकों ने स्पीकर को सौंपा इस्तीफा

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एक ओर जहां सीएम अशोक गहलोत और उनके समर्थक सचिन पायलट को सीएम पद नहीं सौंपने पर अड़े हैं। वहीं, सचिन पायलट इस घटनाक्रम पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।  तीन दिन से चल रहे घटनाक्रम ने पायलट की इस चुप्पी लोग हैरान है कि आखिर वे इस मामले पर चुप्पी क्यों साध रखें। जिस तरह राजस्थान में राजनीति चल रही है। उस पर सारा सवाल अशोक गहलोत  पर उठ रहे हैं। कहा जा रहा कि गहलोत कैम्प के 76 विधायकों ने स्पीकर को अपना इस्तीफा भी सौंप दिया  है। लेकिन इसके आगे क्या होगा ? यह कोई नहीं नहीं बता रहा है। रविवार को रातभर दिल्ली से गए कांग्रेस के पर्यवेक्षकों ने एक एक विधायक से बातचीत की और और जाने की कोशिश की आगे क्या कदम उठाया जाए। लेकिन कहा जा रहा है कि इस मेहनत का भी कोई प्रतिफल सामने नहीं आया।

पायलट की ख़ामोशी: तूफ़ान से पहले की सचिन पायलट की यह ख़ामोशी है।  जानकारों  का कहना है कि जिस तरह से गहलोत कैंप ने राजस्थान की सियासत में भूचाल लाने की कोशिश की है।  उससे काँग्रेस आला कमान भी खुश नहीं है। जानकारों का कहना है कि गहलोत राजस्थान से जाते जाते अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। लेकिन इस शक्ति प्रदर्शन में कांग्रेस का ही घाटा है।  इस नूराकुश्ती में इस बार सचिन भी पीछे हटने वाले नहीं हैं। बताया जा रहा है कि  अगर  आला कमान गहलोत के आगे हथियार डालता है तो सचिन पायलट भी बगावत कर सकते हैं। हालांकि, अभी कुछ समय तक और सचिन पायलट अपना ‘सब्र’ बांधे रखेंगे।

2020 वाला घटनाक्रम दोहरा सकते हैं: राजस्थान में उठे सियासी तूफ़ान से आला कमान गहलोत से नाराज है। ऐसे में माना जा रहा है कि आला कमान गहलोत और उनके समर्थकों को पायलट को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकारने को कहेगा। अगर गहलोत गुट ऐसा नहीं करता है तो  पायलट 2020 वाला घटनाक्रम दोहरा सकते हैं। बता दें कि उन्होंने 2020 में अपने समर्थको के साथ दिल्ली पहुंच गए थे। तब इस मामले को सुलझाने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी आगे आये थे। तब दोनों कांग्रेसी नेताओं ने सचिन पायलट को सही समय आने का इंतजार करने को कहा था। साथ ही उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का भी वादा किया था। लेकिन गहलोत की पैंतरेबाजी के बाद आला कमान भी हैरान है कि आखिर यह सियासी तूफान किस वजह से है ? क्या यह अनुशासनहीनता है ?

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