इस राज्य का सियासी समीकरण हमेशा दो सिनेमाई दिग्गजों के परिवारों के बीच ही घूमता नजर आया। एम करुणानिधि और जे. जयललिता की पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के बीच ही लंबे समय से सत्ता का हस्तांतरण होता रहा।
234 सीटों वाली विधानसभा में थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) 100 सीटों से ज्यादा पर लीड कर रही है। यह आंकड़ा ऐतिहासिक है क्योंकि विजय ने यह करिश्मा ‘अकेले शेर’ की तरह किया है।
2026 का यह विधानसभा चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में बड़े बदलाव का सूचक बना है। इस चुनाव में जनता ने मतदान के जरिए दशकों से डीएमके और एआईएडीएमके के बीच राज्य की पारंपरिक सत्ता संरचना को तोड़ दिया और तमिलनाडु के राजनीतिक जमीन पर सिने स्टार और टीवीके प्रमुख थलपति विजय की शानदार एंट्री का रास्ता खोल दिया।
2021 में सत्ता में आई डीएमके तमिलनाडु में अब सत्ता से दूर होती नजर आ रही है। लेकिन, इस बार उससे सत्ता एआईएडीएमके ने नहीं छिनी, बल्कि इस बार वहां की जनता ने थलपति विजय को अपना राजनीतिक ‘कमांडर’ चुन लिया।
दरअसल, तमिलनाडु में हिन्दी और हिन्दू विरोध की राजनीति के जरिये सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही डीएमके के नेता एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन को एक तो सत्ता विरोधी लहर और दूसरा सनातन विरोधी उनकी पार्टी की विचारधारा ने जनता के दिल से उतार दिया।
तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन ने इस बार पूरा चुनावी अभियान ‘हिन्दी’ विरोध और ‘द्रविड़ पहचान’ पर केंद्रित कर दिया था। जो वहां की जनता को पसंद नहीं आया। वैसे ‘हिन्दी विरोध’ तमिलनाडु की राजनीति का नया मुद्दा नहीं है। राज्य में भाषा और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति लंबे समय से चल रही है।
सीएम एमके स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन के सनातन विरोधी बयान भी राज्य में डीएमके की नैया डुबोने में नंबर एक पर रहे। एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में सनातन विरोधी एक बयान दिया था और पूरे देश के राजनीतिक हलके में इसकी चर्चा जोरों पर रही थी।
अपने बयान में उदयनिधि ने आगे कहा था, “जिस तरह हम मच्छर, डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं, उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए।”
उदयनिधि स्टालिन के इस बयान पर पूरे देश में तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया आई, उन पर मुकदमे भी दर्ज हुए, लेकिन उदयनिधि ने नवंबर 2023 में फिर कहा, “मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। मैं अपने बयान के संबंध में कानूनी परिणाम भुगतने के लिए तैयार हूं। मैंने जो कहा वह सही था और मैं इसका कानूनी तौर पर सामना करूंगा। मैं अपना बयान नहीं बदलूंगा।”
ऐसे में तमिलनाडु की जनता ने वोटिंग के जरिए बता दिया कि सनातन धर्म को लेकर स्टालिन की ये टिप्पणी उन्हें पसंद नहीं आई। वहां मतदाताओं ने डीएमके नेताओं की सनातन धर्म पर टिप्पणियों, मंदिर नियंत्रण और सांस्कृतिक नीतियों से नाराजगी जताई।
वहीं, थलपति विजय की टीवीके ने तमिलनाडु के मतदाताओं के बीच तमिल गौरव के साथ भ्रष्टाचार, युवा बेरोजगारी और बदलाव का नारा दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि शहरी क्षेत्रों, युवा और मध्य वर्ग के वोट विजय की पार्टी के हिस्से में गए।
विजय की राजनीति का स्टाइल भी तमिलनाडु में इस बार अन्य से अलग नजर आया। उन्होंने कमल हासन जैसी ‘इंटलेक्चुअल’ राजनीति नहीं की और न ही चिरंजीवी की तरह बीच में हिम्मत हारी। उन्होंने एमजीआर के ‘मास अपील’ वाले फॉर्मूले पर काम किया और राज्य के युवा मतदाताओं के बीच अपनी ‘थलपति’ वाली इमेज को ‘रक्षक’ की तरह पेश किया।
यह वही तमिलनाडु है जहां कमल हासन और विजयकांत जैसे फिल्मी सितारे दो ध्रुवीय राजनीति के बीच पिस गए, वहीं विजय ने इस बार यहां ऐसी सेंध लगाई है कि वो राज्य के नए पावर सेंटर बनकर उभरे।
द्रमुक और अन्नाद्रमुक के अभेद्य कब्जे वाले तिलिस्म को भेदने का सपना रजनीकांत और कमल हासन जैसे सिनेमाई दिग्गज भी देखते थे। लेकिन, तमिलनाडु की जनता ने व्यवस्था बदलने वाला अपना असली ‘थलपति’ विजय को माना।
2017 में रजनीकांत ने यहां राजनीति में आने का ऐलान किया, लेकिन सालों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अंततः स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उन्होंने कदम पीछे खींच लिए। कमल हासन ने 2018 में ‘मक्कल निधि मय्यम’ पार्टी बनाई। लेकिन उनकी राजनीति और भाषण आम जनता की समझ से परे थे। उनके पास जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भारी कमी थी|
विजय ने यहां अपना पूरा फोकस ‘पहली बार के मतदाता’ और युवाओं पर रखा। दूसरी तरफ तमिलनाडु की राजनीति में बदलाव की एक सुगबुगाहट लंबे समय से चली आ रही थी। जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके कमजोर हुई और डीएमके के खिलाफ जनता के मन में गुस्सा पनप रहा था। ऐसे में वहां लोगों को एक मजबूत, युवा और भरोसेमंद ‘तीसरे विकल्प’ की तलाश थी, जिसे विजय ने भर दिया।
तमिलनाडु में करीब 50 साल पहले एमजी रामचंद्रन ने अपनी नई पार्टी के साथ पहले ही चुनाव में यही कमाल किया था जब उन्होंने वहां पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन किया था। आज विजय ने उसी स्क्रीन-टू-पॉलिटिक्स वाली विरासत को फिर से संभाल लिया है।
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