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Sunday, November 1, 2026
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डोनाल्ड ट्रंप का चार साल का वीज़ा नियम सस्पेंड

भारतीय स्टूडेंट्स को बड़ी राहत

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US में पढ़ रहे विदेशी स्टूडेंट्स को बड़ी राहत मिली है। एक US कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के उस प्रपोज़ल पर रोक लगा दी है जिसमें इंटरनेशनल स्टूडेंट्स और एक्सचेंज विज़िटर्स के US में रहने की लिमिट चार साल तक तय की गई थी। एक फ़ेडरल जज के इस फ़ैसले से भारतीय स्टूडेंट्स को भी बड़ी राहत मिली है।

बोस्टन में US डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज एफ. डेनिस सेलर ने डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी को यह नियम लागू करने से रोक दिया है। कोर्ट ने यह स्टे ऑर्डर नियम के लागू होने से एक दिन पहले जारी किया है। प्रपोज़्ड नियम के मुताबिक, F-1 स्टूडेंट्स और J-1 एक्सचेंज विज़िटर्स के लिए आम लिमिट चार साल तय की जानी थी। जबकि प्रपोज़ल में ज़्यादातर मामलों में विदेशी जर्नलिस्ट्स के रहने की लिमिट 240 दिन तक तय करने की बात थी।

खास बात यह है कि नियम के लागू होने से ठीक एक दिन पहले अदालत ने यह आदेश दिया. प्रस्तावित नियम में एफ-1 स्टूडेंट्स और जे-1 एक्सचेंज विजिटर्स के लिए चार साल की सामान्य सीमा तय की जानी थी. विदेशी पत्रकारों के अमेरिका में रहने की अवधि को भी ज्यादातर मामलों में 240 दिन तक सीमित करने का प्रस्ताव था. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारतीय छात्रों पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या चार साल पूरे होने पर अमेरिका छोड़ना पड़ेगा? पीएचडी करने वाले छात्रों का क्या होगा? और आगे ट्रंप प्रशासन क्या कर सकता है?

जज ने नियम पर रोक क्यों लगाई?

अमेरिकी जज एफ. डेनिस सेलर ने DHS की दलीलों पर काफी सख्त टिप्पणी की. DHS का कहना था कि पुरानी D/S व्यवस्था को खत्म करने से स्टूडेंट वीजा सिस्टम में धोखाधड़ी को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी. लेकिन जज ने इन दलीलों को कमजोर बताया. उनके मुताबिक सरकार ने दशकों से चली आ रही व्यवस्था को बदलने के लिए पर्याप्त और मजबूत आधार नहीं दिया. अदालत ने सिर्फ छात्रों के असर को नहीं देखा. उसने अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर पड़ने वाले असर को भी गंभीर माना. अमेरिका में करीब 16 लाख लोग एफ-1 वीजा पर हैं, जबकि लगभग 5 लाख लोग जे-1 वीजा रखते हैं. अमेरिकी विश्वविद्यालयों, खासकर रिसर्च और ग्रेजुएट प्रोग्राम में विदेशी छात्रों की बड़ी भूमिका है. जज ने चेतावनी दी कि अगर इस व्यवस्था में अचानक बदलाव किया गया तो विदेशी छात्रों का नामांकन घट सकता है और विश्वविद्यालयों को सैकड़ों मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है.

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