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चाबहार पोर्ट पर ट्रंप का कड़ा फैसला, डूबेंगे भारत के करोड़ों डॉलर्स !

सिर्फ आर्थिक झटका नहीं, बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती भी

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के चाबहार पोर्ट पर दी गई प्रतिबंध-छूट (sanctions waiver) को वापस ले लिया है। यह छूट 2018 से लागू थी और भारत को मध्य एशिया व अफगानिस्तान तक आसान पहुंच देती थी। अब 29 सितंबर से यह फैसला प्रभावी होगा, जिसके बाद इस पोर्ट से जुड़े किसी भी ऑपरेशन, वित्तपोषण या सेवा में शामिल लोगों पर अमेरिकी ट्रेज़री के समान प्रतिबंध लागू होंगे।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है, “29 सितंबर से यह छूट समाप्त हो जाएगी। इसके बाद जो भी व्यक्ति चाबहार पोर्ट के संचालन या संबंधित गतिविधियों में शामिल होगा, वह IFCA (Iran Freedom and Counter-Proliferation Act) के तहत प्रतिबंधों का सामना करेगा।”

भारत की रणनीतिक चिंता

चाबहार पोर्ट को भारत लंबे समय से ‘गोल्डन गेट’ मानता आया है, क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का सीधा रास्ता देता है। भारत ने 2024 में इस पोर्ट को 10 साल की लीज़ पर लिया था और 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने के साथ-साथ 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी थी। भारत ने अब तक 6 मोबाइल हार्बर क्रेन और अन्य उपकरण भी उपलब्ध कराए हैं। यह पोर्ट सिर्फ व्यापारिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि रणनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर चीन की बढ़ती मौजूदगी को संतुलित करने में यह भारत का मजबूत जवाब है।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि छूट दिए जाने के समय अफगानिस्तान में निर्वाचित सरकार थी, लेकिन अब वहां तालिबान का शासन है। साथ ही वाशिंगटन का मानना है कि चाबहार प्रोजेक्ट से होने वाली आय ईरान की गतिविधियों को फंड करती है। इसी वजह से “मैक्सिमम प्रेशर पॉलिसी” के तहत छूट वापस लेने का निर्णय लिया गया है। ट्रंप ने कहा, “मैं भारत और उसके प्रधानमंत्री के बहुत करीब हूं, लेकिन यह कदम ईरान को अलग-थलग करने के लिए जरूरी है।”

भारत पर पड़ेगा असर

चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी पाबंदियों की छूट हटाने के फैसले ने भारत के लिए कई मोर्चों पर चुनौती खड़ी कर दी है। सबसे पहले, यह कदम आर्थिक नुकसान का कारण बनेगा क्योंकि भारत द्वारा किए गए करोड़ों डॉलर के निवेश पर संकट खड़ा हो जाएगा और पोर्ट के ऑपरेटर्स अब अमेरिकी दंडात्मक कार्रवाइयों के दायरे में आ जाएंगे। इसके अलावा, भारत की अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच बाधित हो जाएगी, जिससे यूरोप तक जाने वाले इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो चीन और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत की स्थिति कमजोर होगी और इस क्षेत्र में बीजिंग का प्रभाव और मजबूत हो सकता है। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत दबाव में आ सकता है क्योंकि ट्रंप के भारी टैरिफ और रूस से तेल आयात पर टैक्स को लेकर अमेरिका के साथ पहले से ही तनावपूर्ण रिश्ते और बिगड़ सकते हैं। साथ ही, ईरान के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भी इस फैसले से गंभीर संकट में पड़ सकते हैं।

चाबहार पोर्ट पर छूट हटाने का फैसला भारत के लिए सिर्फ आर्थिक झटका नहीं, बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक चुनौती भी है। यह कदम न सिर्फ नई दिल्ली की मध्य एशिया तक की पहुंच को सीमित करेगा, बल्कि चीन और पाकिस्तान को भी बड़ा फायदा पहुंचा सकता है।

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