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रूसी तेल और गैस की खरीद पर हंगरी को एक साल की छूट; अमेरिका का पाखंड उजागर

जैसा कि आप जानते हैं, उनके पास समुद्र नहीं है। यह एक बड़ा और उत्कृष्ट देश है, लेकिन उनके पास समुद्री बंदरगाह नहीं हैं।

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हंगरी को रूसी तेल और गैस की खरीद पर लगाए गए प्रतिबंधों से एक वर्ष की छूट दे दी है। यह घोषणा शुक्रवार (7 नवंबर) को व्हाइट हाउस द्वारा की गई। यह निर्णय उस बैठक के बाद आया, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने आपसी संबंधों और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में दोनों नेताओं की पहली आधिकारिक मुलाकात थी।

ओरबान ने बैठक के दौरान कहा कि हंगरी की भौगोलिक स्थिति उसे ऊर्जा स्रोतों के विकल्प चुनने में सीमित करती है। हंगरी के पास समुद्री मार्ग या बंदरगाह नहीं हैं, जिसके कारण तेल और गैस के वैकल्पिक स्रोत प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसी संदर्भ में ओरबान ने अमेरिका से प्रतिबंधों में राहत देने का अनुरोध किया था।

ट्रंप ने इस संबंध में कहा, “हम इस पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके लिए अन्य क्षेत्रों से तेल और गैस लाना बहुत अलग परिस्थिति है। जैसा कि आप जानते हैं, उनके पास समुद्र नहीं है। यह एक बड़ा और उत्कृष्ट देश है, लेकिन उनके पास समुद्री बंदरगाह नहीं हैं।” ट्रंप ने ओरबान को “हंगरी में प्रिय मित्र” कहा, वहीं ओरबान ने उम्मीद जताई कि अमेरिका-हंगरी संबंधों का एक “स्वर्ण युग” शुरू हो सकता है।

हंगरी को मिली इस छूट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, खासकर इसलिए क्योंकि अमेरिका यूरोप में रूसी ऊर्जा पर निर्भरता घटाने के प्रयासों को लेकर लगातार सख्त रुख अपनाता रहा है। कई विश्लेषकों के अनुसार, यह रियायत हंगरी की ऊर्जा सुरक्षा पर ट्रंप की सहमति और दोनों नेताओं के वैचारिक और राजनीतिक निकटता को दर्शाती है।

इसी अवधि में भारत के लिए अमेरिका का रुख बिल्कुल अलग रहा है। भारत ने रूस से सस्ते तेल की खरीद को ऊर्जा लागत और विकास की आवश्यकता से जोड़कर सही ठहराया है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि वह ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण कर रहा है। इसके बावजूद, पिछली चर्चाओं और नीतिगत रुख में अमेरिका द्वारा भारत पर 50% तक दंडात्मक टैरिफ लगाए गए। भारत की बड़ी आबादी और बड़ी ऊर्जा जरूरतों के चलते भारत को रूस से तेल खरीदना अनिवार्य हो चूका है, हालांकि इस खरीदी पर रोक लगाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन चीन और भारत दोनों देशों से व्यापार संबंध ख़राब कर चूका है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह रियायत यूरोपीय ऊर्जा बाजार और अमेरिका की विदेश नीति दोनों पर प्रभाव डाल सकती है। साथ ही यह सवाल भी बना रह गया है कि क्या अन्य देश भी भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर इसी तरह की छूट की मांग कर सकते हैं।

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