इसी कड़ी में बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने वाले अलंकार अग्निहोत्री का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस्तीफे के बाद निलंबन की कार्रवाई से नाराज अग्निहोत्री अब खुलकर मैदान में आ गए हैं और निलंबन के विरोध में धरने पर बैठ गए हैं।
यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर रविवार को भी विरोध प्रदर्शन हुए, जो सोमवार को और तेज हो गए। खास बात यह है कि इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं। कुछ नेताओं ने नए विनियमों के विरोध में अपने पदों से इस्तीफा देकर सियासी हलचल बढ़ा दी है।
बरेली के एडीएम कंपाउंड में स्थित सिटी मजिस्ट्रेट आवास के मुख्य गेट को पुलिस ने पूरी तरह बंद कर दिया है। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों का कहना है कि यह कार्रवाई उच्च स्तर से मिले निर्देशों के तहत की गई है।
सोमवार को उन्होंने इस्तीफा सौंपते हुए शंकराचार्य के अपमान और यूजीसी कानून के विरोध को इसकी वजह बताया था। रात में जिलाधिकारी से मुलाकात के बाद मामला और गरमा गया, जब अग्निहोत्री ने जिला प्रशासन पर बंधक बनाए जाने का आरोप लगाया। हालांकि जिलाधिकारी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। देर रात शासन ने अलंकार अग्निहोत्री को निलंबित कर दिया।
निलंबन की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए अग्निहोत्री ने स्पष्ट किया है कि वह इसके खिलाफ न्यायालय की शरण लेंगे। मंगलवार सुबह से ही उनके आवास के बाहर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है, जिससे पूरे इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है।
उधर, भाजपा किसान मोर्चा के मंडल अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने यूजीसी कानून के विरोध में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने यह इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए भेजा है। त्रिपाठी का कहना है कि यह कानून समाज को जोड़ने के बजाय उसे बांटने का काम करेगा और इसके दूरगामी परिणाम घातक साबित हो सकते हैं।
इसी तरह बख्शी तालाब क्षेत्र के कुम्हारवां मंडल से जुड़े भाजपा महामंत्री अंकित तिवारी ने भी पार्टी से दूरी बना ली है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूजीसी के नए प्रावधानों से समाज के एक बड़े वर्ग के बच्चों के शैक्षणिक भविष्य पर संकट खड़ा हो गया है। अंकित तिवारी ने अपने सभी संगठनात्मक दायित्वों से इस्तीफा देने की घोषणा की है।
यूजीसी कानून के खिलाफ संगम नगरी में भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। सैकड़ों की संख्या में लोग हाथों में पोस्टर और बैनर लेकर सड़कों पर उतरे और सरकार से कानून को वापस लेने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह विधेयक शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा करेगा और समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा।
यूजीसी के नए प्रावधानों के अनुसार उच्च शिक्षा संस्थानों में किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी सामाजिक पहचान, लिंग, मूल स्थान या शारीरिक स्थिति के आधार पर अलग व्यवहार नहीं किया जा सकेगा। नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि वंचित और कमजोर वर्गों से आने वाले छात्रों और कर्मचारियों को समान अवसर, सुरक्षा और सम्मान देना संस्थानों की जिम्मेदारी होगी, ताकि उनके अधिकारों का प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
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