उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक बार फिर न्यायपालिका की भूमिका पर सख्त सवाल खड़े करते हुए कहा कि भारत में अंतिम निर्णय का अधिकार संसद के पास है और निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही संविधान के असली स्वामी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में मंगलवार (22अप्रैल)को एक संबोधन के दौरान उन्होंने न्यायपालिका की कथित ‘ओवररीच’ (सीमाओं से अतिक्रमण) पर खुलकर चिंता जताई और कहा कि “संविधान की कोई ऐसी कल्पना नहीं है कि संसद के ऊपर कोई प्राधिकरण हो”।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता निशिकांत दुबे और उपराष्ट्रपति ने हाल ही में शीर्ष अदालत पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने का आरोप लगाया था।
धनखड़ ने याद दिलाया कि 1977 में आपातकाल लगाने वाले प्रधानमंत्री को जनता ने सत्ता से बाहर कर जवाबदेह ठहराया था। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता के प्रतिनिधियों के पास होता है। उन्होंने कहा, “संविधान जनता के लिए है, और यह जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि उसके स्वरूप को तय करें। संसद ही सर्वोच्च है और वह उतनी ही सर्वोच्च है जितना इस देश का हर नागरिक।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति शासन संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायपालिका पर “कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप” के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी गई थी। न्यायमूर्ति बीआर गवई ने टिप्पणी की थी, “आप चाहते हैं कि हम राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्देश दें? वैसे ही हम पर कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल देने के आरोप लगते रहते हैं।”
धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि एक मामले (गोर्कनाथ केस) में कोर्ट ने प्राक्कथन (Preamble) को संविधान का हिस्सा नहीं माना, जबकि दूसरे (केशवानंद भारती केस) में उसे संविधान का हिस्सा बताया गया। यह विरोधाभास उनके अनुसार, न्यायिक व्याख्याओं की अस्पष्टता को दर्शाता है।
उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में संवाद का महत्व सर्वोपरि है और संस्थाओं को नीचा दिखाने या व्यक्तियों को बदनाम करने की प्रवृत्ति खतरनाक हो सकती है। उन्होंने दो टूक कहा, “हमारी चुप्पी बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। लोकतंत्र में विचारशील लोगों को अपनी भूमिका निभानी ही चाहिए।”
उन्होंने इस मौके पर सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बाधा डालने वालों को चेताते हुए कहा कि ऐसे तत्वों को पहले समझाना होगा, और यदि ज़रूरत पड़ी तो “कड़वी दवा” देने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
धनखड़ की इस दो-टूक टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर देश में एक गंभीर विमर्श की ज़रूरत है। लेकिन यह विमर्श तब तक सार्थक नहीं हो सकता जब तक वह गरिमा और संतुलन के साथ न हो। संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका — तीनों स्तंभों की सीमाएं स्पष्ट हैं, लेकिन इन सीमाओं की व्याख्या जब सत्ता संघर्ष के संदर्भ में होती है, तब लोकतंत्र का मूल तानाबाना ही संकट में आ सकता है।
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