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शिकागो धर्म महासभा और स्वामी विवेकानंद का अमर संदेश, आज 132 वर्ष पुरे !

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११ सितंबर १८९३ को शिकागो के “हॉल ऑफ कोलंबस” में विश्व धर्म महासभा का ऐतिहासिक आयोजन हुआ। आज इस ऐतिहासिक पल के 132 वर्ष पुरे हो रहें है। इस महासभा की मूल परिकल्पना न्यायाधीश चार्ल्स कैरॉल बॉनी की थी, जिसका उद्देश्य था – विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को एक साथ लाना, धर्मों के बीच समानताओं को प्रस्तुत करना और आपसी सद्भाव की भावना को बढ़ाना। परंतु आयोजकों के मन में गुप्त रूप से यह धारणा भी थी कि ईसाई धर्म ही “सर्वोच्च धर्म” इसे विश्व में रूढ़ करने की थी।

इसी पृष्ठभूमि में प्रवेश हुआ स्वामी विवेकानंद का, जिन्होंने इतिहास बदलकर रख दिया। सात हज़ार से अधिक श्रोताओं के बीच जब उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत “अमेरिका की मेरी बहनों और भाइयों” शब्दों से की, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह स्वागत लगभग दो मिनट तक चलता रहा। उसी क्षण विवेकानंद ने पश्चिमी दुनिया के हृदय को छू लिया और पूर्व-पश्चिम के बीच आत्मीय सेतु बना दिया।

अपने भाषण में उन्होंने भारत को “सभी धर्मों की जननी” बताया और कहा, “हम केवल सहिष्णुता में विश्वास नहीं रखते, बल्कि सभी धर्मों को सत्य मानकर स्वीकार करते हैं।” इस विचार ने सहिष्णुता से आगे जाकर सर्वधर्म समभाव और सार्वभौमिक स्वीकार्यता का एक नया दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत के इतिहास का हवाला देकर कहा कि किस प्रकार इस भूमि ने पारसियों और यहूदियों जैसे पीड़ित समुदायों को शरण दी।

महासभा के दौरान स्वामीजी ने कुल सात से आठ भाषण दिए। इनमें “हिंदू धर्म पर निबंध” (१९ सितंबर) विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, जिसमें उन्होंने हिंदू धर्म से जुड़े पश्चिमी भ्रमों को तोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद कोई मात्र ग्रंथ नहीं, बल्कि युगों-युगों से ऋषियों द्वारा खोजे गए शाश्वत आध्यात्मिक नियमों का संकलन हैं। उन्होंने पाश्चात्य धर्मशास्त्र में प्रचलित “मूल पाप” (Original Sin) की अवधारणा को नकारते हुए कहा, “मनुष्य को पापी कहना ही सबसे बड़ा पाप है।”

उन्होंने कर्म और पुनर्जन्म की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत की, मूर्ति-पूजा को आध्यात्मिक विकास की एक आवश्यक अवस्था बताया और धार्मिक संकीर्णता पर कड़ी चोट की। उनका संदेश था, “मदद करो, संघर्ष मत करो। आत्मसात करो, विरोध मत करो। सद्भाव और शांति चाहिए, कलह नहीं।”

स्वामी विवेकानंद के विचारों नेअमेरिका और यूरोप में हिंदू धर्म की नयी छवि गढ़ी, साथ ही योग और वेदांत को भी वहां लोकप्रिय बनाया। न्यूयॉर्क में उनकी वेदांत सोसायटी की स्थापना ने पश्चिम में आध्यात्मिक शोध और संवाद की स्थायी नींव रखी। वैज्ञानिक निकोला टेस्ला और दार्शनिक विलियम जेम्स जैसे महान मस्तिष्क भी उनसे प्रभावित हुए। भारत में उनके शिकागो भाषण की गूंज ने आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को नयी ऊर्जा दी। “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको” का उनका आह्वान स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणास्रोत बना। नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे नेता उनके विचारों से गहराई से प्रभावित हुए।

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी समाज में भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता स्थापित की और भारतीय जनमानस को यह विश्वास भी दिलाया कि पराधीन होते हुए भी भारत विश्व को अमूल्य आध्यात्मिक संदेश दे सकता है। शिकागो का वह भाषण एक युगांतरकारी संदेश था जिसने भारत को नई दिशा और विश्व को नया दृष्टिकोण दिया।

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