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Wednesday, January 21, 2026
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अर्थ सहित श्री गणपति अथर्वशीर्ष, जानें कैसे पढ़ना चाहिए दिव्य मंत्र !

जानें गणेश अथर्वशीर्ष की व्याख्या

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गणेशोत्सव बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और जीवन में ज्ञान, विवेक व आनंद का आलोक भरने का पावन उत्सव है। इस समय गणेश भक्त अथर्ववेद के परायण करते है। अथर्ववेद में वर्णित गणपति अथर्वशीर्ष शास्त्र, गणेशजी की महिमा का अद्भुत बखान किया है। इसमें गणेश को ब्रह्मरूप मानकर सृष्टि के आदि, मध्य और अंत सभी का आधार बताया गया है। मंत्रजाप और पाठ से जीवन की विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं, मनुष्य सत्य, धर्म और मोक्ष के पथ पर अग्रसर होता है।

सार्थ अथर्वशीर्ष:

ॐ नमस्ते गणपतये॥१॥

अर्थ: ओंकार (ॐ) सहित हे गणपति! तुम्हें मेरा प्रणाम।
व्याख्या: गणेश जी आद्य ईश्वर मानें जाते है, वहीं ओम की ध्वनी के साथ उन्हें अभिवादन किया जाता है। ‘ॐ’ पवित्र ध्वनि है और “नमस्ते गणपतये” कहकर गणेश को विघ्नहर्ता श्रीगणेश को नमन किया गया है।

 
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥२॥

अर्थ: हे गणपति! स्वयं ही तुम प्रत्यक्ष तत्त्व हो। स्वयं ही तुम संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र कर्ता (सृजनहार) हो। स्वयं ही तुम एकमात्र धर्ता (पालनहार) हो। स्वयं ही तुम एकमात्र हर्ता (संहारक) हो। तुम स्वयं पूरे जगत् में व्याप्त ब्रह्म हो। तुम साक्षात सदा के लिए आत्मस्वरूप हो।
व्याख्या: इस श्लोक में गणेश जी को सर्वसक्तिमान ब्रह्म बतलाया गया है। ‘त्वमेव तत्त्वमसि’ कहकर उन्हें ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि और सम्पूर्ण जगत का निर्माता-पारग्रह समझाया गया है। यह पंक्ति मंत्र के माध्यम से हर वस्तु में गणेश का स्थान बताती है।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥३॥

अर्थ: मैं (जो कुछ कह रहा हूँ) वह रीति (धर्म) सहित है। मैं सत्य ही बोलता हूँ।
व्याख्या: इसमें वक्ता सत्यता की घोषणा करता है। अपने प्रातः या किसी मन्त्र के आरंभ में इस प्रकार सत्य बोलने से पाठ की सत्यता सुनिश्चित होती है।

 अव त्वं माम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्।
अव धातारम्। अवानूचानमव शिष्यम्। अव पुरस्तात्।

अव दक्षिणात्। अव पश्चात्। अवोत्तरात्। अव चोर्ध्वात्।
अवाधरात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात्॥४॥

अर्थ: हे गणेश! तू अब मेरी रक्षा कर (अव त्वं माम्)। वक्ता (उपदेशक) की रक्षा कर (अव वक्तारम्)। श्रोता (शिष्य) की रक्षा कर (अव श्रोतारम्)। ज्ञान देने वाले की रक्षा कर (अव दातारम्)। ज्ञान धारण करने वाले की रक्षा कर (अव धातारम्)। उपदेश सुनाने वाले आचार्य और शिष्य की रक्षा कर (अवानूचानम् अव शिष्यम्)। पूर्व (देखो पश्चिम से), दक्षिण से, पश्चिम से, उत्तर से, ऊपर से, नीचे से, और चारों दिशाओं से मेरी रक्षा करो (अव पुरस्तात् … सर्वतो मां पाहि समंतात्)।
व्याख्या: इसमें गणेश से प्रार्थना की गई है कि वे वक्ता, श्रोता, आचार्य, शिष्य और सम्पूर्ण जगत की सुरक्षा करें। पूर्व-उत्तर-दक्षिण-पश्चिम, ऊर्ध्व (ऊपर) और अधर (नीचे) सभी दिशाओं से रक्षा की कामना की गई है। अर्थात् मन, वचन, कर्म से गणेश रक्षा करें।


त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥५॥

अर्थ: हे गणपति! तुम वाङ्मय हो और तुम चित्तमय हो (शब्द और चैतन्य से परिपूर्ण)। तुम आनन्दमय और ब्रह्ममय हो। तुम सत-चित-आनंद (सच्चिदानंद) के अद्वितीय स्वरूप हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय और विज्ञानमय हो।
व्याख्या: इस श्लोक में गणेश को चेतना, आनंद और ज्ञान का आधार बताया गया है। ‘त्वं आनन्दमयः’ कहकर उनके पूर्ण आनंद से सम्बन्धित होने का अर्थ बताया गया है। ‘त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि’ कहकर उनका ज्ञान और विवेक से परिपूर्ण होना बताया गया है।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥

अर्थ: यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुममें ही विद्यमान रहता है। यह सारा जगत् अंततः तुममें ही लय हो जाता है। यह सारा जगत् अंत में तुममें ही लौट कर आता है। (और) तुम भूमि, तुम जल, तुम अग्नि, तुम वायु, तुम आकाश हो। तुम चारों प्रकार की वाणी (पार, पश्चात्तय, मैत्राम्, वैखरी) हो।
व्याख्या: इस श्लोक में गणेश को सृष्टि के मूलकारण के रूप में दर्शाया गया है। बताया गया कि सारा जगत उनका ही विस्तार है—उनसे जन्मता है, उनके द्वारा संचालित होता है और अंत में उसी में लय हो जाता है। पाँच तत्त्वों (भूमि, आप (जल), अनिल (वायु), अनल (अग्नि), नभ (आकाश)) और वाणियों का आदर्श स्वरूप भी गणेश में माना गया है।


“गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादि तदनंतरम्। अनुस्वारः परतरः।
अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्।

गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।
बिंदुरुत्तररूपम्। नादः संधानम्। संहितासंधिः॥

सैषा गणेशविद्या। गणकऋषिः। निचृद्गायत्रीच्छंदः।
गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः॥

अर्थ: गणेश-मंत्र ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का स्वरूप बताया गया है। (संक्षेप में:) गण के ‘ग्’ अक्षर के उच्चारण से मंत्र की शुरुआत होती है, उसके बाद ‘अ’, फिर ‘मूर्ध्न्य (अनुस्वार)’ से ‘गं’ बनेगा। बिंदु से ‘गँ’ बनेगा और ओंकार (‘ॐ’) जुड़ने पर मंत्र पूर्ण होता है। यह गणेश विद्या है। इसमें गणक ऋषि हैं, गायक तंत्र गायत्री छंद है, गणपति देवता हैं। अंत में मंत्र ‘ॐ गं गणपतये नमः’ उच्चारित किया गया है।
व्याख्या: यह श्लोक गणपति-मंत्र की व्युत्पत्ति समझाता है। बताया गया कि कैसे ‘ॐ गं’ बनेगा और यह मंत्र गणेश की विद्या है। गणेश का बीज मंत्र ‘ॐ गं गणपतये नमः’ है, जिससे गणेश की उपासना होती है।

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

अर्थ: एकदंत को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्तधारी हमें प्रेरणा प्रदान करे (प्रबोधन करे)।
व्याख्या: यह गणेश गायत्री मंत्र है। एकदंत और वक्रतुण्ड (वक्र सूंड) गणेश जी के रूप हैं। उनका स्मरण (ध्यान) मन को प्रेरणा देता है।

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्। रदं च वरदं हस्तैर्‌बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैस्सुपूजितम्॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥

अर्थ: गणेश की रूपरेखा: एकदंत (एक-दाँत) और चार भुजाएँ हैं। दो हाथों में पाश और अंकुश धारण किए हैं, तीसरे हाथ में दन्त (दाँत) है और चौथे में वरद मुद्रा है। उनका ध्वज मूषक (चूहे) का रूप है। शरीर लाल वस्त्र-लाल वर्ण का है, लंबोदर (मोठी उदर) है, बड़े-बड़े पंखे जैसे कान हैं। लाल वस्त्र ओढ़े हुए हैं। शरीर लाल चंदन से अभिषिक्त है और लाल पुष्पों से अच्छी तरह पूजित है। वे भक्तों पर कृपा करने वाले देव हैं, जगत के कारण (आधार) और कभी नाश होने वाले (अच्युत) हैं। सृष्टि के आरंभ में प्रकृति-पुरुष (प्रकृति से परे सर्वोच्च पुरुष) से ही उनका अवतरण हुआ। जो व्यक्ति इस प्रकार उनका ध्यान प्रतिदिन करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ कहलाता है।
व्याख्या: इस श्लोक में गणेश जी का दैहिक वर्णन है: लाल वर्ण, बड़ा उदर, चार हाथ, पाश-अंकुश-दन्त-वरद मुद्रा आदि। भक्तों पर उनकी असीम करुणा का उल्लेख है (भक्तानुकम्पिनं), और बताया है कि वे जगत-कारण (सभी का आधार) व अच्युत हैं। जो नियमित इन्हें ध्यान कर ध्यानमग्न रहता है, वह योगियों में श्रेष्ठ होता है।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नमः प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय। विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः॥

अर्थ: (विभिन्न नामों में) प्रणाम है वृत्त (व्रत-पति), गणपति, प्रमथपति (शिव के गणों के स्वामी) को। नमस्कार लम्बोदर (मोठी उदर) और एकदंत को, विघ्ननाशक को, शिवपुत्र को तथा वरदमूर्ति को।
व्याख्या: यहाँ गणेश जी के अनेक नामों (व्रतपति, गणपति, प्रमथपति, लम्बोदर, एकदंत, विघ्ननाशक, शिवसुत, वरदमूर्ति) से उन्हें प्रणाम किया गया है। ये सभी नाम गणेश के विभिन्न गुणों का बोध कराते हैं।


एतद् अथर्वशीर्षं योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। स सर्वत्र सुखमेधते। स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते॥

अर्थ: जो कोई इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है, वह ब्रह्म को प्राप्त करने योग्य बनता है। उसको सर्व प्रकार के विघ्न बाधक नहीं हो पाते। वह सर्वत्र सुखी होता है। वह पाँचों प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है।
व्याख्या: यहां पाठ का वर बताया गया है: अथर्वशीर्ष जपने वाला ब्रह्मज्ञानयोग्यता प्राप्त करता है। उसके आगे बाधाएँ टिक नहीं पातीं, उसे सर्वत्र आनंद की प्राप्ति होती है और वह महान पापों (आत्मा को घोर विघ्नों वाला पाप) से छुटकारा पाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो पापोऽपापो भवति। सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति॥

अर्थ: शाम को जो इसका पाठ करता है, वह दिन में किए हुए पापों को नष्ट कर देता है। प्रातः जो पाठ करता है, वह रात्रि में किए पापों का नाश करता है। दोनों समय (सायंकाल और प्रातः) जो निरंतर जप करता है, वह निष्पाप हो जाता है। जो कहीं भी इसका पाठ करता है, वह सभी बाधाओं (विघ्नों) से रहित होता है। उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
व्याख्या: प्रतिदिन सुबह और शाम पाठ करने से पाप नष्ट होते हैं, और विघ्न बाधाएँ दूर होती हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—सभी फल प्राप्त होते हैं।

इदम् अथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥

 अर्थ: यह अथर्वशीर्ष अशिक्षित (अशिष्य) को नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण इसे दे देगा, वह पापियों में होता है। जो इस अथर्वशीर्ष का सहस्त्र (हज़ार बार) पाठ करता है, उसमें (अपने द्वारा) जितने भी काम हैं, उन्हें यही साध्य करेगा (सिद्धि देगा)।
व्याख्या: इस श्लोक में कहा गया है कि अथर्वशीर्ष केवल योग्य व्यक्ति को ही पढ़ाया जाना चाहिए। जो इसे बिना साधना के दूसरों को देता है, वह पापी हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति इसे एक हजार बार जपता है, तो इस मंत्र से उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।


अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति। चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वणवाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। न बिभेति कदाचनेति॥

अर्थ: जो इस अथर्वशीर्ष से गणपति का अभिषेक (स्नान/पूजा) करता है, वह वाग्मी (वक्ता, प्रवचन में निपुण) बनता है। जो चतुर्थी के दिन व्रत रखकर जप करता है, वह विद्वान (ज्ञानवान) बनता है। यह अथर्ववाक्य है: जिसने ब्रह्म आदि का आवरण जाना, उसे कभी भी भय नहीं होता।
व्याख्या: कहा गया कि गणेश की पूजा-अर्चना से वक्तृत्व और विद्या की प्राप्ति होती है। “अथर्वण वाक्यं” कहलाने से यह श्लोक ब्रह्मज्ञानप्रद माना गया है, जिससे ज्ञान की प्राप्ति और भयमुक्ति होती है।

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति। यस्साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥

अर्थ: जो दूर्वा-अंकुरों से यज्ञ करता है, वह कुबेर समान वैभववान होता है। जो लाज (परिपक्व धान्य) से यज्ञ करता है, वह यशवान् होता है। वह मेधावी बनता है। जो सहस्रों मोदक से यज्ञ करता है, वह अपनी मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृत-समिधा से यज्ञ करता है, वह सबकुछ प्राप्त करता है।
व्याख्या: गणेश को प्रसन्न करने के लिए दूर्वा, परिपक्व धान्य, मोदक एवं घृत-समिधा से यज्ञ करने पर विशेष फल प्राप्ति होती है। दूर्वा अर्पण करने से धन-वैभव मिलता है, लाज (खली चावल) देने से कीर्ति मिलती है, हजारों मोदक देने से इच्छित लक्ष्य पूरा होता है, और घृतयुक्त समिधा यज्ञ से सर्वसिद्धियाँ होती हैं।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ।
सूर्यग्रहेमहानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति
महाविघ्नात् प्रमुच्यते ।
महादोषात् प्रमुच्यते ।
महाप्रत्यवायात् प्रमुच्यते ।
स सर्वविद् भवति स सर्वविद् भवति ।
य एवान् वेद ।
इत्युपनिषत् ॥ 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अर्थ: जो कोई यह उपनिषद् आठ ब्राह्मणों को ठीक प्रकार से सुनाए/सिखाए, वह सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है। जो कोई (विशेषतः) सूर्यग्रहण के समय, या किसी महान नदी के तट पर, या गणपति की प्रतिमा के सम्मुख जप करे, उसका मंत्र सिद्ध हो जाता है। वह बड़े-विघ्नों (महाविघ्न) से मुक्त हो जाता है। वह बड़े दोषों (गंभीर दोष/पाप) से छु्टकारा पाता है। वह ऐसी परिस्थितियों/अपवायाओं से भी मुक्त हो जाता है जो जीवन को बहा ले जाने जैसी हों। वह सर्वज्ञ (सब-ज्ञानवान) हो जाता है।
व्याख्या: ये अंतिम पंक्तियाँ उपनिषद् के पाठ/अध्ययन के पारलौकिक और सांसारिक फल बताती हैं, शिक्षा (अष्ट ब्राह्मणों को पढ़ाना), विशेष स्थल/समय पर जप (सूर्यग्रहण, नदीतट, प्रतिमा-सन्निधि) और नियमित श्रद्धापूर्वक अभ्यास से मंत्रसिद्धि, तेज, विघ्न-निवारण और पापों से मुक्ति जैसे लाभ प्राप्त होते हैं।


अथर्ववेद के पाठ के लिए सुबह शुद्ध होकर आसन पर बैठकर पूर्व या ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए। संभव हो तो १०८ या १००८ बार जप करने का संकल्प लें। नियमित अथर्वशीर्ष जप से मन में शांति आती है, बुद्धि-विवेक बढ़ते हैं, तथा गणेशजी की विशेष कृपा होती है। पाठ करने से जीवन में विद्या (ज्ञान) प्राप्ति होती है और सभी विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं।

मंत्र जाप के दौरान गणेश की मूर्ति या चित्र का ध्यान करें और उनके नामों (एकदंत, वक्रतुण्ड, विघ्नराज इत्यादि) का स्मरण करें। दूर्वा, लाल फूल, मोदक आदि चढ़ाकर उनकी अर्चना करें। इस पाठ का सही प्रभाव पाने को मंत्रजाप करते समय श्रद्धा एवं ध्यान जरूरी है।

पवित्रता के साथ जप करने से दोष नाश होता है; शयन से पूर्व अथवा निद्रा से पूर्व इसे पढ़ने से पापों का विनाश होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का निरन्तर पठण भक्त को मोक्ष तक पहुँचा देता है।

उपसंहारतः, गणपति अथर्वशीर्ष मंत्र में गणेश जी को ब्रह्मरूप बताकर उनके सभी रूपों व शक्तियों का बखान किया गया है। इसका अध्ययन और जप गणेश की अनुकम्पा अर्जित करने का महत्वपूर्ण साधन है। इसके निरन्तर पाठ से मन की शुद्धि होती है, जीवन में सहजता आती है तथा गणेशजी का आशीर्वाद बना रहता है।

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