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केरल हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: मुस्लिम पर्सनल लॉ संवैधानिक सिद्धांतों को दरकिनार नहीं कर सकता!

मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी दर्ज करने से पहले पहली पत्नी को सुने बिना रजिस्ट्रेशन नहीं

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केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी को Kerala Registration of Marriages (Common) Rules, 2008 के तहत दर्ज नहीं किया जा सकता, जब तक पहली पत्नी को अपना पक्ष रखने का अवसर न दिया जाए। जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन द्वारा 30 अक्टूबर 2025 को दिए गए इस फैसले में कहा गया कि यदि पहली पत्नी दूसरी शादी को अवैध बताते हुए आपत्ति करती है, तो रजिस्ट्रार को विवाह पंजीकरण रोक देना चाहिए और मामले को सक्षम न्यायालय के पास भेजना चाहिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पुरुष को पर्सनल लॉ के तहत दूसरी शादी करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन संविधान द्वारा सुनिश्चित समानता, सुनवाई और न्याय के सिद्धांतों को इससे दरकिनार नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश ने कहा, “यदि पहली पत्नी अपने पति के दूसरे विवाह के पंजीकरण पर यह आरोप लगाते हुए आपत्ति करती है कि दूसरा विवाह अवैध है, तो रजिस्ट्रार को दूसरे विवाह का पंजीकरण नहीं करना चाहिए, तथा पक्षों को उनके धार्मिक प्रथागत कानून के अनुसार दूसरे विवाह की वैधता स्थापित करने के लिए सक्षम न्यायालय में मामला भेजना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि पति ने पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी महिला से प्रेम संबंध और विवाह किया, जो न तो शरीयत और न ही कुरान द्वारा स्वीकृत है। न्यायालय ने धार्मिक ग्रंथ के प्रासंगिक पाठ का हवाला देते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि पवित्र कुरान या मुस्लिम कानून किसी अन्य महिला के साथ विवाहेतर संबंध की अनुमति देता है, जबकि उसकी पहली पत्नी जीवित है और उससे उसका पहला विवाह अस्तित्व में है, और वह भी उसकी पहली पत्नी की जानकारी के बिना। पवित्र कुरान और हदीस से प्राप्त सिद्धांत सामूहिक रूप से सभी वैवाहिक व्यवहारों में न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों का आदेश देते हैं।”

उच्च न्यायालय ने कहा कि कुरान में दूसरी शादी के लिए पहली पत्नी की सहमति की स्पष्ट रूप से आवश्यकता नहीं है, लेकिन दूसरी शादी के पंजीकरण से पहले उसकी सहमति लेना या कम से कम उसे सूचित करना न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता के मूल्यों के अनुरूप होगा, जो संवैधानिक और धार्मिक दोनों सिद्धांतों के केंद्र में हैं। अदालत ने आगे कहा, “एक मुस्लिम पहली पत्नी अपने पति की दूसरी शादी के पंजीकरण के दौरान मूक दर्शक नहीं रह सकती, भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ कुछ स्थितियों में किसी पुरुष को दूसरी शादी की अनुमति देता हो।”

अदालत ने अपने फैसले में कहा,“लैंगिक समानता प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ नहीं हैं। यह केवल महिला मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अधिकार का विषय है।”

अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पहली पत्नी को इस मामले में पक्षकार ही नहीं बनाया गया था। हालांकि, पति और दूसरी पत्नी को दोबारा आवेदन करने की अनुमति दी गई है, शर्त यह कि रजिस्ट्रार पहली पत्नी को नोटिस जारी कर उसकी बात सुने।

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