29 C
Mumbai
Thursday, February 5, 2026
होमधर्म संस्कृतिलोकमान्य तिलक ने कैसे बनाया गणेशोत्सव को महाराष्ट्र का विराट सामूहिक पर्व!

लोकमान्य तिलक ने कैसे बनाया गणेशोत्सव को महाराष्ट्र का विराट सामूहिक पर्व!

Google News Follow

Related

कुछ ही दिनों में महाराष्ट्र की गलियों और चौकों में गणपति बप्पा मोरया के जयघोष गूंजेंगे। ढोल-ताशों की थाप के बीच 27 अगस्त से शुरू हो रहा गणेश चतुर्थी महोत्सव लाखों श्रद्धालुओं को एकजुट करेगा। आज यह त्योहार महाराष्ट्र की सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, लेकिन यह हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी यह पर्व केवल घरों तक सीमित, एक निजी धार्मिक अनुष्ठान हुआ करता था।

इस निजी पर्व को सार्वजनिक आंदोलन में बदलने का श्रेय जाता है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (1856–1920) को। वर्ष 1893 में जब गुजरात के प्रभास पाटन और मुंबई में भीषण हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, तब तिलक ने गणेश महोत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देने का निर्णय लिया। इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में हिंदू समाज अक्सर मोहम्मदन मोहर्रम जुलूसों में भाग लेता था। तिलक ने लोगों की ऊर्जा को नई दिशा दी और उन्हें गणेशोत्सव के आयोजन में जोड़ा।

धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक Lokamanya Tilak: Father of the Indian Freedom Struggle में लिखा है,
“हिंदू, जो अब तक मोहर्रम में शामिल होते थे, अब उन्होंने वह छोड़कर गणेश महोत्सव में अपनी शक्ति लगाई। तिलक की संगठन क्षमता और नेतृत्व ने इस निजी पर्व को सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया। उन्होंने लोगों में सामूहिकता की भावना जगाई।”

गणेश महोत्सव के लिए जगह-जगह सार्वजनिक मंडल बने। युवा ढोल-ताशे, भजन मंडलियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जुटे। तिलक ने इस उत्सव को न सिर्फ धार्मिक गर्व का प्रतीक बनाया, बल्कि इसे औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना जगाने का माध्यम भी बना दिया।

इतिहासकार वैभव पुरंदरे अपनी जीवनी Tilak: The Empire’s Biggest Enemy में कहते हैं, “यह माना जाता है कि तिलक ने ‘सार्वजनिक गणेशोत्सव’ की शुरुआत लोगों को अपनी भारतीयता जताने और अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संगठित करने के लिए की। हालांकि प्रारंभ में यह अधिकतर हिंदू अस्मिता का प्रदर्शन था, लेकिन आगे चलकर यह ब्रिटिश राज के खिलाफ जनजागरण का बड़ा मंच बन गया।”

तिलक ब्रिटिश नीतियों की कटु आलोचना करते थे। वे लिखते और कहते थे कि औपनिवेशिक शासन ने भारत की संपत्ति लूट ली, जनता को निर्धनता में धकेला और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता को क्षति पहुंचाई। उनके लिए स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं बल्कि न्याय और आत्मसम्मान का संघर्ष थी।

उनके ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’ इस ऐतिहासिक नारे ने पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन की नई अलख जगाई। आज महाराष्ट्र का यह सार्वजनिक गणेशोत्सव, जिसे हर वर्ष लाखों लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं, वास्तव में तिलक की उस दूरदर्शिता और साहसिक नेतृत्व का परिणाम है जिसने एक निजी अनुष्ठान को सांस्कृतिक-राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया।

यह भी पढ़ें:

ट्रंप टैरिफ़ झटके से निपटने की तैयारी: भारत ने की 50 नए निर्यात बाज़ारों की पहचान !

सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर कोलिजियम में मतभेद, क्षेत्रीय संतुलन पर उठे सवाल!

भारत विज्ञापन बाजार हिस्सेदारी 2029 तक जीडीपी में 0.5 प्रतिशत!

पीएम मोदी जाएंगे जापान शिखर वार्ता और चीन एससीओ बैठक में!

National Stock Exchange

लेखक से अधिक

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

The reCAPTCHA verification period has expired. Please reload the page.

Star Housing Finance Limited

हमें फॉलो करें

151,277फैंसलाइक करें
526फॉलोवरफॉलो करें
290,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

अन्य लेटेस्ट खबरें