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Saturday, February 21, 2026
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नवरात्र का तीसरा दिन: चंद्रघंटा देवी भक्तों को बनाती हैं निर्भय और सौम्य  

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आज शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन है। इस दिन यानी तीसरे दिन चंद्रघंटा स्वरूप देवी की पूजा अर्चना की जाती है। कहा जाता है माता रानी का स्वरूप भक्तों पर अपर कृपा बरसाती हैं। उनकी कृपा से भक्त निर्भय और सौम्य बनता है। मां चंद्रघंटा के नाम से घंटा  जुड़ा हुआ है। घंटा ध्वनि सभी ध्वनियों में शुद्ध मानी जाती है। घंटा की ध्वनि ऊर्जा को बढ़ाती है। ज्योतिषियों का मानना है कि जिन जातकों का चन्द्रमा दुर्बल हो वे माता चंद्रघंटा की उपासना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

दूध से बने पकवान का लगाएं भोग: मां चंद्रघंटा को दूध से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है, मां को केसर की खीर और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए। पंचामृत, चीनी व मिश्री भी मां को अर्पित करनी चाहिए।
ये है मंत्र: पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
मां चंद्रघंटा की कथा: बहुत समय पहले जब असुरों का आतंक बढ़ गया था तब उन्हें सबक सिखाने के लिए मां दुर्गा ने अपने तीसरे स्वरूप में अवतार लिया था। दैत्यों का राजा महिषासुर राजा इंद्र का सिंहासन हड़पना चाहता था जिसके लिए दैत्यों की सेना और देवताओं के बीच में युद्ध छिड़ गई थी। वह स्वर्ग लोक पर अपना राज कायम करना चाहता था जिसके वजह से सभी देवता परेशान थे। सभी देवता अपनी परेशानी लेकर त्रिदेवों के पास गए।
मां चंद्रघंटा करती हैं शेर की सवारी: माता का तीसरा रूप मां चंद्रघंटा शेर पर सवार हैं। दसों हाथों में कमल और कमडंल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं। माथे पर बना आधा चांद इनकी पहचान है। इस अर्ध चांद की वजह के इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां चंद्रघंटा की पूजा में उपासक को सुनहरे या पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए आप मां को खुश करने के लिए सफेद कमल और पीले गुलाब की माला अर्पण करें। मां दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघण्टा हैं। माता के मस्तक पर घण्टे के आकार का चंद्र शोभित है।  यही इनके नाम का आधार है। देवी एकाग्रता की प्रतीक हैं और आरोग्य का वरदान देने वाली है।  असल में नाद ही सृष्टि की चलायमान शक्ति है। यह ऊंकार का स्त्रोत है और सृष्टि की प्रथम ध्वनि है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति खुद की एकाग्र नहीं रख पते हैं उन्हें माता चंद्रघंटा की पूजा उपासना करनी चाहिए। इससे लाभ मिलता है।
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