सुप्रीम कोर्ट में बहुचर्चित सबरीमला मामला एक बार फिर केंद्र में आ गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में नौ जजों की संविधान पीठ ने आज से इस मामले पर सुनवाई शुरू कर दी है। यह मामला केवल सबरीमला मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को भी संबोधित करेगा।
इस संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, एम एम सुन्द्रेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमल्या बागची शामिल हैं।
सुनवाई के केंद्र में संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा और उसका समानता तथा गरिमा जैसे अन्य मौलिक अधिकारों के साथ संतुलन है। पीठ यह भी तय करेगी कि अदालतें धार्मिक प्रथाओं में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती हैं और आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) की परिभाषा क्या होगी।
सबरीमला से आगे का प्रभाव
हालांकि मुख्य मामला सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है, लेकिन इसका असर अन्य धार्मिक मुद्दों पर भी पड़ सकता है। इनमें पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिरों में प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा, बहुविवाह और निकाह हलाला जैसे मुद्दे शामिल हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ जैन संगठनों ने भी इस मामले में अपने लिखित तर्क प्रस्तुत किए हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 बहुमत से सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, ए एम खानविलकर और डी वाई चंद्रचूड़ ने बहुमत का फैसला दिया था, जबकि न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताई थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं। 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को बड़ी पीठ को सौंप दिया था।
अदालत ने सुनवाई के लिए विस्तृत समय-सारिणी तय की है। 7 से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार याचिकाओं के समर्थन में पक्ष रखे जाएंगे, जो अदालत के धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। वहीं 14 से 16 अप्रैल तक महिला अधिकार समूहों सहित विरोधी पक्ष अपनी दलीलें पेश करेंगे। 21 अप्रैल को जवाबी दलीलें और 22 अप्रैल को अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेेश्वर अपनी प्रस्तुतियां देंगे। अब तक 81 पक्षकार लिखित तर्क दाखिल कर चुके हैं।
सुनवाई से ठीक पहले केंद्र सरकार और केरल सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक भगवान अयप्पा के नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप से जुड़ी है और यह महिलाओं की हीनता या अशुद्धता पर आधारित नहीं है।
केंद्र ने यह भी तर्क दिया कि इस परंपरा में बदलाव से पूजा की मूल प्रकृति प्रभावित होगी और संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक बहुलता पर असर पड़ेगा। केरल सरकार ने भी अदालत को बताया कि वह अब पारंपरिक प्रथाओं के पक्ष में है और न्यायिक हस्तक्षेप का विरोध करती है।
नौ जजों की यह पीठ पहले व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों को तय करेगी, जिसके बाद व्यक्तिगत मामलों में सबरीमला विवाद भी शामिल है, पर अन्य पीठों द्वारा अलग से सुनवाई की जा सकती है। आने वाले हफ्तों में होने वाली यह सुनवाई भारत में धर्म, अधिकारों और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।
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