गुढी पाड़वा हिंदू धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। यह खास तौर पर महाराष्ट्र में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। गुढी पाड़वा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आता है, जो हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन घर के बाहर गुढी (विजय ध्वज) स्थापित की जाती है और नीम की पत्तियां तथा शक्कर की माला चढ़ाकर नए वर्ष का स्वागत किया जाता है। यह दिन साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक माना जाता है, इसलिए इस दिन नई चीजों की खरीद, व्यापार की शुरुआत, नए कार्यों का शुभारंभ और सोना खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है।
गुढी पाड़वा पारंपरिक नववर्ष की शुरुआत को दर्शाता है। यह वसंत ऋतु का त्योहार है, जो नई शुरुआत, समृद्धि और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। कुल मिलाकर, गुढी पाड़वा मराठी नववर्ष का प्रतीक है। इस दिन घर के सामने गुढी स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
हिंदू धर्म के साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में गुढी पड़वा भी एक अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर माता सीता के साथ इसी दिन अयोध्या लौटे थे, इसलिए इस दिन आनंद उत्सव मनाया जाता है। वहीं, यह भी माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इसे वर्ष का पहला दिन माना जाता है। इन सभी कारणों से गुढी पड़वा का महत्व आज भी कायम है।
गुढी कैसे स्थापित करें?
बांस की एक लंबी लकड़ी के ऊपर रेशमी वस्त्र बांधा जाता है और उसके ऊपर चांदी या पीतल का कलश उल्टा रखा जाता है। इसके साथ नीम की टहनी, शक्कर की माला और फूलों की माला बांधी जाती है। इस तरह सजी हुई गुढी को घर के प्रवेश द्वार के पास स्थापित किया जाता है और उसकी पूजा की जाती है। साथ ही घर के सामने सुंदर रंगोली बनाई जाती है और दीपक जलाया जाता है। गुढी की श्रद्धा से पूजा कर पारंपरिक व्यंजनों का नैवेद्य भी अर्पित किया जाता है।
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