क्या सोलर फार्म और खेती साथ-साथ संभव हैं?

एग्रीवोल्टाइक्स पर बढ़ता शोध और सरकारी निवेश

क्या सोलर फार्म और खेती साथ-साथ संभव हैं?

Is it possible to have solar farms and farming side-by-side?

बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और सीमित भूमि संसाधनों के बीच यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या सोलर फार्म और खेती एक ही जमीन पर साथ-साथ की जा सकती है। इसी संदर्भ में एग्रीवोल्टाइक्स (Agrivoltaics) या ड्यूल-यूज़ सोलर को एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर सरकारों और शोध संस्थानों का ध्यान लगातार बढ़ रहा है।

आमतौर पर बड़े ग्राउंड-माउंटेड सोलर फोटोवोल्टिक (PV) प्लांट केवल बिजली उत्पादन के लिए जमीन का उपयोग करते हैं। एग्रीवोल्टाइक्स इस पारंपरिक मॉडल से अलग है। इसमें सोलर पैनलों के नीचे या पैनलों की कतारों के बीच कृषि गतिविधियां भी की जाती हैं। इनमें फसल उत्पादन, पशु चराई या परागणकर्ताओं के लिए प्राकृतिक आवास विकसित करना शामिल हो सकता है। उद्देश्य यह है कि एक ही जमीन से ऊर्जा और कृषि, दोनों का लाभ लिया जा सके।

एग्रीवोल्टाइक्स पर हो रहा शोध किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण भूमि मालिकों को यह समझने में मदद करता है कि सोलर सिस्टम लगाकर भी वे अपनी जमीन को खेती के लिए कैसे उपयोग में रख सकते हैं। चूंकि सोलर ऊर्जा प्रणाली आमतौर पर 25 वर्ष या उससे अधिक की दीर्घकालिक निवेश योजना होती है, इसलिए इससे जुड़े लाभ, जोखिम और आर्थिक प्रभावों की सटीक जानकारी बेहद जरूरी मानी जाती है।

शोध से संकेत मिलता है कि सोलर और कृषि की सह-स्थापना से किसानों को आय के विविध स्रोत, पर्यावरणीय लाभ और भूमि उपयोग को लेकर कम प्रतिस्पर्धा जैसे फायदे मिल सकते हैं। इसके साथ ही, यह बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए भूमि चयन से जुड़ी बाधाओं को भी कम कर सकता है।

एग्रीवोल्टाइक्स शोध यह भी जांचता है कि सोलर पैनलों की छाया फसलों पर क्या असर डालती है, मिट्टी की नमी और तापमान में क्या बदलाव आते हैं, और इससे पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है। कुछ अध्ययनों में यह सामने आया है कि सही योजना और डिजाइन के साथ पैनलों के नीचे उगाई जाने वाली कुछ फसलों को लाभ भी हो सकता है। इसके अलावा, मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के लिए आवास विकसित कर जैव विविधता को बढ़ावा देने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।

कुल मिलाकर, एग्रीवोल्टाइक्स को भूमि उपयोग, ऊर्जा उत्पादन और कृषि स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की एक उभरती रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर आगे के वर्षों में शोध और नीतिगत ध्यान और बढ़ने की संभावना है।

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