इससे पहले इस्राइल ने ईरान के इन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी, लेकिन भूमिगत होने के कारण इन पर कोई निर्णायक असर नहीं पड़ा। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस्राइली सेना के पास ऐसे हथियार नहीं हैं जो गहराई में बने इन ठिकानों को नुकसान पहुंचा सकें। अमेरिका की एंट्री के साथ ही इस पूरे संकट ने वैश्विक सुरक्षा समुदाय की चिंता बढ़ा दी है।
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का तीखा हमला
इस घटनाक्रम पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने न केवल अमेरिका और इस्राइल की आलोचना की, बल्कि पाकिस्तान और ट्रंप पर भी जमकर निशाना साधा। ओवैसी ने कहा:
“क्या पाकिस्तान ने इसलिए डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की सिफारिश की थी? क्या इसलिए पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर व्हाइट हाउस में ट्रंप के साथ लंच कर रहे थे? आज सब बेनकाब हो गए हैं।”
ओवैसी ने यह भी कहा कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों से यह स्पष्ट हो गया है कि ‘शांति’ की बातें सिर्फ दिखावा थीं।
पाकिस्तान और ट्रंप की नोबेल की सियासत
दरअसल, पाकिस्तान की ओर से आधिकारिक तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की घोषणा की गई है। पाकिस्तान का तर्क है कि भारत-पाक संघर्ष के दौरान ट्रंप की मध्यस्थता ने क्षेत्र को बड़े युद्ध से बचाया। यह एलान ऐसे समय में हुआ जब पाक सेना प्रमुख असीम मुनीर को व्हाइट हाउस में औपचारिक तौर पर आमंत्रित किया गया था।
हालांकि भारत ने ट्रंप के इस दावे को सिरे से खारिज किया है। भारतीय पक्ष का कहना है कि पाकिस्तान को संघर्ष रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसे भारतीय सेना की कड़ी जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ा था।
भविष्य की चिंता: बढ़ते तनाव के वैश्विक असर
अमेरिकी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव गहरा गया है। कूटनीतिक हलकों में आशंका जताई जा रही है कि ईरान इस हमले का जवाब दे सकता है, जिससे पूरा खाड़ी क्षेत्र एक लंबे युद्ध की चपेट में आ सकता है। साथ ही इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, अब तक कच्चे तेल की कीमतों में अपेक्षाकृत स्थिरता देखी गई है। एमके रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल के करीब बनी हुई है और अगर कोई व्यापक युद्ध नहीं छिड़ता, तो कीमतें 70 डॉलर से नीचे आ सकती हैं।
पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी और हमलों ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर इस संवेदनशील क्षेत्र पर खींचा है। डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां, पाकिस्तान की रणनीति और ओवैसी जैसी विपक्षी आवाज़ें इस मामले को और जटिल बना रही हैं। आने वाले दिनों में इसका असर केवल कूटनीति पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी साफ़ देखा जाएगा।



