छांगुर धर्म परिवर्तन न करने वालों को सबक सिखाने में प्रशासनिक मशीनरी का प्रयोग भी बेखौफ होकर करता था। धर्म परिवर्तन के लिए राजी होने पर मोटी रकम देता था। करीब 15 वर्षों से चल रहे इस खेल का खुलासा तब हुआ, जब उसके करीबियों को यह करतूत नागवार गुजरी। इसके बाद विरोध का एक दौर शुरू हुआ।
उन्होंने बताया कि छांगुर धर्म परिवर्तन कराने के लिए पहले कलमा पढ़ाता था और फिर प्रतिबंधित पशु का मांस खिलाता था। इससे वह संतुष्ट होना चाहता था कि हिंदू धर्म से मोहभंग हुआ या नहीं।
इस पूरी प्रक्रिया की वह फोटो खींचता था और वीडियो बनाता था। उसे इस्लामिक देशों की उन संस्थाओं को भेजता था, जो धर्मांतरण के लिए फंड देती थीं। जांच में जुटी एटीएस को ऐसे देशों से फंड मिलने के सुराग भी मिले हैं।
फंड को सुरक्षित करने के लिए छांगुर ने ट्रस्ट बना रखा था। छांगुर के एक सहयोगी के अनुसार वह औरंगजेब को आदर्श मानता था। उससे जुड़ी पुस्तकों को भी पढ़ता था।
छांगुर अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च करता था। उसकी शिकायत करने वाले बब्बू चौधरी बताते हैं कि उन्हें फंसाने और खुद को बचाने के लिए छांगुर ने पानी की तरह पैसे खर्च किए। बाराबंकी और बहराइच के कुछ पेशेवर लोगों को सुपारी भी दी, 25 लाख रुपये तो एफआईआर दर्ज कराने पर खर्च कर दिए। इसके अलावा वह हर काम के लिए खर्च तय करता था।
छांगुर ने अपने कद को कद्दावर बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए थे। पुणे की एक संस्था का पदाधिकारी बना था। प्रदेश स्तरीय पद का एक नियुक्ति पत्र हासिल किया था, जिसपर प्रधानमंत्री की भी तस्वीर भी लगी थी। इसकी शिकायत पीएमओ तक हुई और जांच शुरू हुई।
संस्था के सहारे ही छांगुर खुद को राष्ट्रवादी मुस्लिम के रूप में प्रस्तुत कर केंद्र सरकार तक पकड़ का दावा करता था। इसके पीछे पुणे की संस्था के मुखिया इदुल इस्लाम का हाथ था। राजनीतिक और प्रशासनिक पहुंच वाला इदुल हमेशा छांगुर के साथ खड़ा हो जाता था। इसी संस्था के दम से उसने तमिलनाडु और कर्नाटक में संबंध जोड़े थे। केरल और कोलकाता में भी वह जमीन तैयार कर रहा था।
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