14 जुलाई को भारत उस निर्भीक विचारक और समाज सुधारक की जयंती मना रहा है। उन्होंने न केवल ब्रिटिश राज के विरुद्ध स्वाभिमान की आवाज उठाई, बल्कि भारतीय समाज के भीतर बैठे अंधकार को दूर करने के लिए सत्य, तर्क और सुधार का मार्ग अपनाया। यह अवसर उन्हें सिर्फ याद करने का नहीं बल्कि उनके विचारों को जीने का भी है।
14 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के तेम्मू गांव में जन्मे गोपाल गणेश आगरकर का प्रारंभिक जीवन आर्थिक तंगहाली में बीता, लेकिन शिक्षा के प्रति अदम्य ललक ने उन्हें पुणे के दक्कन कॉलेज तक पहुंचाया। यहीं से उनकी वैचारिक यात्रा शुरू हुई, जो बाद में पूरे महाराष्ट्र और भारत के समाज सुधार आंदोलन की नींव बनी।
जहां तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ साप्ताहिक पत्रों के जरिए राष्ट्रवाद का स्वर उठाया, वहीं आगरकर ने ‘सुधारक’ नामक साप्ताहिक पत्र के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मोर्चा खोला। ‘केसरी’ के पहले संपादक के रूप में उन्होंने सामाजिक आलोचना की नींव रखी, लेकिन बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर तिलक से मतभेद के चलते 1887 में अलग हो गए और ‘सुधारक’ की शुरुआत की।
19वीं सदी के अंत में महाराष्ट्र दो वैचारिक धाराओं का गवाह बना। तिलक हिन्दू परंपराओं की रक्षा के पक्षधर थे और आगरकर पश्चिमी बौद्धिक परंपराओं से प्रेरित समाज सुधारक थे। तिलक जहां सामाजिक सुधारों के लिए ब्रिटिश हस्तक्षेप को अस्वीकार करते थे, वहीं आगरकर मानते थे कि अगर भारत को प्रगति करनी है, तो जातिवाद, छुआछूत, बाल विवाह और स्त्री अशिक्षा जैसे मुद्दों से पहले निपटना होगा।
गोपाल गणेश आगरकर न केवल जाति प्रथा के घोर विरोधी थे, बल्कि उन्होंने ‘विधवा विवाह’, ‘सह शिक्षा’, ‘नारी शिक्षा’, और ‘विवाह की न्यूनतम आयु’ जैसे मुद्दों को भी मुखरता से उठाया। उन्होंने कहा था कि जब तक स्त्री को समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक समाज अपंग रहेगा।
केवल 43 वर्ष की आयु में 17 जून 1895 को आगरकर का निधन हो गया, लेकिन उनका विचार आज भी जीवित है। मुंबई का ‘आगरकर चौक’ आज भी उनकी स्मृति को जीवंत करता है।
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