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Sunday, January 11, 2026
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कपिल सिब्बल की दलील पर भड़का SC, कहा- CJI पोस्ट ऑफिस नहीं!

कपिल सिब्बल ने महाभियोग सिफारिश को असंवैधानिक बताया है​|​  

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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है|​ जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास पर आग के दौरान बरामद कथित कैश मामले में इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट और तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना की महाभियोग सिफारिश को चुनौती दी है|​ 

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच के सामने सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने वर्मा का पक्ष रखते हुए जोरदार दलीलें दीं|​ सिब्बल ने कहा कि महाभियोग संसद की विशेष प्रक्रिया है और सीजेआई द्वारा इसकी सिफारिश करना असंवैधानिक है|​ सुनवाई सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट फैसला सुरक्षित रख लिया|
सिब्बल ने तर्क दिया कि इन-हाउस जांच केवल एक तथ्य-परख तंत्र है, जिसका कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं है|​ यह साक्ष्य अधिनियम के नियमों का पालन नहीं करता और न ही इसे न्यायाधीश को हटाने की कार्यवाही शुरू करने का आधार बनाया जा सकता है|​ 
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 124 और जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 मिलकर न्यायाधीशों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया तय करते हैं|​ इन-हाउस प्रक्रिया के जरिए इसे दरकिनार करना एक समानांतर, अतिरिक्त-संवैधानिक तंत्र बनाना होगा|​ 

सिब्बल ने स्पष्ट किया कि जस्टिस वर्मा इन-हाउस प्रक्रिया को प्रशासनिक उपाय के रूप में स्वीकार करते हैं और CJI की प्रशासनिक शक्ति जैसे न्यायिक कार्य आवंटन रोकने को चुनौती नहीं दे रहे|​ उनकी आपत्ति इस प्रक्रिया के आधार पर महाभियोग शुरू करने पर है|​ 

सिब्बल ने जवाब दिया कि जब सिफारिश हटाने की हो तो यह संसद के विशेषाधिकार में हस्तक्षेप करती है|​ उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा को उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और बिना ठोस सबूत जैसे- नकदी का स्रोत या मात्रा को देखे बिना निष्कर्ष निकाले गए|​ 

कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि किसी इन-हाउस जांच प्रक्रिया के आधार पर न्यायाधीश को हटाने की कार्यवाही शुरू करना एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा, क्योंकि न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया केवल संविधान के अनुच्छेद 124 और जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट के तहत ही संभव है|

इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सवाल किया कि इन-हाउस प्रक्रिया, जिसे तीन पुराने फैसलों में मान्यता दी गई है और जो जस्टिस कृष्ण अय्यर के सिद्धांतों पर आधारित है, क्या उसे पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है? और यदि अदालत सिब्बल की बात से सहमत हो, तो फिर वह क्या राहत दे सकती है?

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने आगे कहा कि CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है|​ CJI की राष्ट्र के प्रति भी जिम्मेदारी बनती है|​ अगर CJI के पास ऐसा मटेरियल उपलब्ध है, जिनके आधार पर उन्हें जज का कदाचार लगता है तो वो निश्चित तौर पर पीएम और राष्ट्रपति को सिफारिश भेज सकते हैं|

इस मामले की शुरुआत 14 मार्च 2025 को हुई, जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली आवास पर आग लगने के दौरान दमकल कर्मियों ने कथित तौर पर जले हुए नोट बरामद किए|​ इसके बाद तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी एस संधवालिया, और कर्नाटक हाईकोर्ट की जज अनु शिवरामन शामिल थीं|​ 

समिति ने तीन मई को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें वर्मा के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले गए​ |​ सीजेआई ने इसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजकर महाभियोग की सिफारिश की. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने मामले को अगले सप्ताह तक टालने की मांग की, लेकिन जस्टिस दत्ता ने तुरंत सुनवाई शुरू करने का फैसला किया|​ 
कपिल सिब्बल ने बेंच को बताया कि उन्होंने संवैधानिक मुद्दों पर बिंदु तैयार किए हैं|​ कोर्ट ने सिब्बल से समिति की रिपोर्ट और एक पेज का नोट जमा करने को कहा, जिसमें मुख्य दलीलें हों|​ सुनवाई अब बुधवार को भी जारी रहेगी|​ 
 
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