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रक्षा मंत्रालय के हजारों एकड़ बेकार जमीनों के लिए आखिर क्या है प्लान? 

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नई दिल्ली। रक्षा मंत्रालय अपनी बेकार पड़ी जमीनों को बेचने की तैयारी में है। मंत्रालय ने यह निर्णय सुमित बोस समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया है। मंत्रालय इस संबंध में तीनों बलों सहित अन्य विभागों को पत्र लिखकर इसे अमल में लाने को कहा है। मंत्रालय चाहता है कि अनुपयुक्त जमीनों का सही इस्तेमाल किया जाये। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने बेकार पड़ी जमीनों को तीन वर्गों में बांटा है। छह मई को रक्षा मंत्रालय ने तीनों सशस्त्र बलों के आलावा डीआरडीओ, तटरक्षक बल,आयुध निर्माणी बोर्ड समेत अन्य विभागों को एक चिट्ठी भेजी है। चिट्टी में कहा गया है कि रक्षा मंत्रालय की बेकार पड़ी जमीन को तीन महीने के भीतर संकलित किया जा सकता है और महानिदेशक रक्षा संपदा (डीजीडीई) के साथ अटैच किया जा सकता है। इन अपेक्षित शेष जमीन में से कुछ पुराने ब्रिटिश समय के कैंपिंग ग्राउंड हैं जिनका उपयोग लंबे अभियानों को जारी रखने के लिए किया जाता था।

कुछ जमीन पर द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) में स्थापित पुराने अप्रयुक्त हवाई अड्डे हैं। कुछ जमीन अब नागरिक क्षेत्रों के भीतर आते हैं। इसका कुछ ही हिस्सा सैन्य उद्देश्य के लिए होता है। कुछ जमीन पर आयुध कारखानों के पास हैं। रक्षा मंत्रालय खाली जमीन की दो श्रेणियों की पहचान करने पर विचार कर रहा है। पहली श्रेणी A-2 और दूसरी B-4 हैं। छावनी भूमि प्रशासन नियम, 1937 ने सभी जमीनों के उपयोग, स्थान और भविष्य के विस्तार के अनुसार बेंच-मार्क किया है। क्लास ए-2 भूमि वास्तव में सैन्य अधिकारियों द्वारा उपयोग या कब्जा नहीं किया जाता है बल्कि अस्थायी रूप से उपयोग किया जाता है। क्लास बी-4 भूमि वह है जो किसी अन्य वर्ग की भूमि में शामिल नहीं है।बता दें कि सुमित बोस समिति की सिफारिशों पर कार्रवाई करने के रक्षा मंत्रालय के निर्णय के आधार पर लिखा दया है। भारत सरकार के पूर्व राजस्व सचिव ने दिसंबर 2017 में 131 सिफारिशों के साथ एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। बोस समिति की सिफारिश, रक्षा मंत्रालय द्वारा एक अध्ययन के बाद, तीन श्रेणियों के तहत वर्गीकृत की गई है।

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