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बिहार ने फिर ठुकराया तेजस्वी यादव का ‘परिवर्तन’ नैरेटिव; राज्य नेता मानने को क्यों तैयार नहीं

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे एक बार फिर साफ संकेत देते हैं तेजस्वी यादव को लेकर मतदाताओं की झिझक अब भी दूर नहीं हुई है। इस बार RJD का प्रदर्शन और भी कमजोर रहा। पार्टी 40 सीटों के नीचे सिमटती दिख रही है, जबकि 2020 में वह 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। यह सिर्फ़ चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व को लेकर जनता के अविश्वास का दोहराया गया संदेश है।

तेजस्वी ने 2020 की तरह इस बार हर घर में सरकारी नौकरी और रोजगार-केंद्रित अभियान पर दांव लगाया, लेकिन मतदाताओं के लिए यह दोहराव बनकर रह गया। समस्या मुद्दे में नहीं, विश्वास में थी। लोगों को लगा कि तेजस्वी सिर्फ़ समस्याओं को गिनाते हैं, समाधान की ठोस योजना नहीं दिखाते। उनका यह नैरेटिव इस बार विश्वसनीयता की परीक्षा में फेल हो गया।

बिहार चुनाव का अंतिम और निर्णायक मोर्चा अब वर्षों से महिलाओं का वोट रहा है। यहीं तेजस्वी सबसे ज़्यादा पिछड़ गए। तेजस्वी ने ‘माई बहिन मान योजना’ जैसे ऐलान किए, किसानों और महिलाओं को प्रोत्साहन देने की कोशिश की, लेकिन ये सब नितीश कुमार की स्थापित विश्वसनीयता के आगे फीके पड़े, ख़ासकर तब जब नितीश ने चुनाव से ठीक पहले 25 लाख महिलाओं को ₹10,000 की सहायता दी। महिलाओं ने स्थिरता, भरोसा और सुरक्षा के नाम पर NDA को तरजीह दी।

तेजस्वी खुद को ‘A to Z नेता’ साबित करना चाहते थे, लेकिन RJD अब भी कई मतदाताओं की नज़र में सीमित सामाजिक आधार वाली पार्टी मानी जाती है। EBC, दलित, महिलाओं, युवा सभी को जोड़ने की कोशिश की, मगर यह गठजोड़ ज़मीन पर नहीं बन पाया। बिहार की राजनीति में विस्तृत सामाजिक गठबंधन जरूरी है—तेजस्वी इस चुनौती को पार नहीं कर पाए।

RJD के खिलाफ सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक अवरोध आज भी वही लालू-राबड़ी शासन काल का ‘जंगल राज’ नैरेटिव है। तेजस्वी आधुनिक और साफ़ छवि बनाने की कोशिश करते रहे, लेकिन विपक्ष हर बार पुरानी यादें ताज़ा कर देता है, जिससे मतदाता जोखिम लेने को तैयार नहीं होते। भय, असुरक्षा और अव्यवस्था की वह छवि RJD को आज भी भारी पड़ती है।

2020 में तेजस्वी का अभियान शक्तिशाली रहा लेकिन, 2025 में RJD से आंतरिक असंतोष की खबरें, राहुल गांधी की ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ कर ध्यान भटकाना, महागठबंधन में तालमेल की कमी, तेजस्वी का बिखरा और प्रतिक्रियात्मक अभियान, यह सब मिलकर जनता के मन में यह सवाल खड़ा कर गया क्या तेजस्वी एकजुट देने लायक भी है ?

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