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76 वा गणतंत्र दिवस: 2000 से 2026 तक कितना रहा भारत का शिक्षा बजट; नामांकन से गुणवत्ता तक

6% जीडीपी लक्ष्य अभी दूर

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पिछले दो दशकों में भारत के शिक्षा क्षेत्र पर सार्वजनिक व्यय में लगातार वृद्धि हुई है, जो बढ़ती आबादी, शिक्षा नामांकन में विस्तार और नीतिगत सुधारों की जरूरतों को दर्शाती रही है। हालांकि वित्त वर्ष 2000-01 में जहां केंद्र और राज्यों को मिलाकर शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च लगभग ₹82,486 करोड़ था, वहीं 2022-23 के बजट अनुमान में यह बढ़कर ₹9,41,746 करोड़ तक पहुंच गया। इस तरह, शिक्षा पर सरकारी खर्च में 11 गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। दौरान वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय को ₹1,28,650 करोड़ आवंटित किए, जो पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से 13% अधिक है।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर खर्च लंबे समय से 3.3% से 4.6% के दायरे में ही बना रहा है। 2000 से 2022 के बीच औसतन यह करीब 3.82% रहा, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और कोठारी आयोग द्वारा सुझाए गए 6% लक्ष्य से अब भी कम है। 2021 में कोविड-19 के बाद पुनरुद्धार प्रयासों के दौरान यह अनुपात 4.64% तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद फिर करीब 4% के आसपास स्थिर हो गया।

आंकड़ों के अनुसार, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा मिलकर 2004-05 में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी के केवल 3.36% तक था, जो 2000 के दशक के सबसे निचले स्तरों में से एक था। इसके बाद 2005-06 से 2008-09 के बीच खर्च ₹1.13 लाख करोड़ से बढ़कर ₹1.86 लाख करोड़ हो गया। 2011-12 में यह पहली बार ₹3.7 लाख करोड़ के पार गया । हालांकि 2015 के बाद केंद्र की ओर से शिक्षा बजट में खासा रुची दिखने लगी 2015-16 में यह बजट पहली बार 5,70,000 लाख करोड़ तक पहुँचा। 2019-20 तक ₹8.75 लाख करोड़ तक पहुंच गया। महामारी से प्रभावित 2020-21 में खर्च का स्तर ऊंचा बना रहा, जबकि 2022-23 में यह ₹9.41 लाख करोड़ के करीब रहा। अनुमानों के अनुसार, 2026-27 तक कुल सार्वजनिक शिक्षा व्यय ₹11 लाख करोड़ के आसपास पहुंच सकता है, जो जीडीपी का लगभग 4% होगा।

GDP के अनुपात में भारत का शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च (केंद्र + राज्य )

वर्ष खर्च(₹ करोड़ ) GDP के अनुपात में
2000-01 82,486 4.28%
2001-02 79,866 3.81%
2002-03 85,507 3.78%
2003-04 89,079 3.51%
2004-05 96,694 3.36%
2005-06 1,13,229 3.45%
2006-07 1,37,384 3.64%
2007-08 1,61,420 3.74%
2008-09 1,86,499 3.78%
2009-10 ~2,15,000 (est.) ~3.80%
2010-11 ~2,60,000 (est.) ~3.55%
2011-12 3,72,680 ~4.26%
2012-13 ~4,41,629 ~4.44%
2013-14 ~5,15,692 3.84%
2014-15 ~5,70,000 (est.) ~4.10%
2015-16 ~6,20,000 (est.) ~4.10%
2016-17 ~6,80,000 (est.) ~4.20%
2017-18 ~7,40,000 (est.) ~4.30%
2018-19 ~8,00,000 (est.) ~4.20%
2019-20 8,75,429 ~4.30%
2020-21 ~8,50,000 (est., COVID-affected) 4.50%
2021-22 9,19,145 (RE) 4.30%
2022-23 9,41,746 (BE) 4.12%
2023-24 ~9,80,000 (est.) ~4.10%
2024-25 ~10,20,000 (est.) ~4.00%
2025-26 ~10,60,000 (est.) ~4.00%
2026-27 ~11,00,000 (proj.) ~4.00%

 

नीतिगत फैसलों ने इस यात्रा को आकार दिया। 2001 में सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत से प्राथमिक शिक्षा में बड़ा विस्तार हुआ और नामांकन दरों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 2020 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने बहु-विषयक शिक्षा, कौशल विकास और अनुसंधान पर जोर दिया, जिसके बाद स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों में आवंटन बढ़े।

वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केवल केंद्र सरकार की बात करें तो शिक्षा मंत्रालय के लिए ₹1,28,650 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से 13% अधिक है। इसमें स्कूल शिक्षा के लिए ₹78,572 करोड़ और उच्च शिक्षा के लिए ₹50,078 करोड़ शामिल हैं। समग्र शिक्षा, पीएम पोषण और पीएम-श्री जैसे कार्यक्रमों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिसका उद्देश्य महामारी के बाद सीखने की क्षति की भरपाई और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना है।

इसके बावजूद, विशेषज्ञों का कहना है कि खर्च का स्तर अभी भी गुणवत्ता, समानता और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों को पूरी तरह दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है। राज्यों के बीच असमानता, शिक्षकों की कमी और कौशल अंतर जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। जैसे-जैसे भारत 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश को 6% जीडीपी तक ले जाना एक प्रमुख नीति चुनौती बना हुआ है।

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