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Thursday, June 18, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों पर पुलिस कार्रवाई की याचिका सुनवाई ठुकराई! 

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों के पास प्रतिनिधित्व देकर कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की मांग कर सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती का आरोप लगाया गया था।

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामले राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों के पास प्रतिनिधित्व देकर कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की मांग कर सकता है।

यह जनहित याचिका अनुच्छेद 32 के तहत अधिवक्ता उज्जवल गौर ने स्वयं पेश होकर दायर की थी। इसमें प्रयागराज में माघ मेले के दौरान, खासकर मौनी अमावस्या के अवसर पर, राज्य की ओर से ‘मनमानी, हिंसक और असंवैधानिक कार्रवाई’ के आरोप लगाए गए थे।

याचिका में दावा किया गया कि ज्योतिष पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ आए बटुकों को 18 जनवरी को संगम में पारंपरिक स्नान करने की कोशिश के दौरान पुलिसकर्मियों ने ‘जबरन घसीटा, हमला किया और बेरहमी से पीटा।’

घटना से जुड़े वीडियो और तस्वीरों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि नाबालिगों को उनकी चोटी पकड़कर खींचा गया और उनके साथ बल प्रयोग किया गया। इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन बताते हुए ‘क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार’ करार दिया गया।

याचिका में प्रयागराज मेला प्रशासन द्वारा जारी नोटिसों पर भी सवाल उठाए गए, जिनमें ‘शंकराचार्य’ की धार्मिक उपाधि के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था और जमीन आवंटन व सुविधाएं रद्द करने की चेतावनी दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग करते हुए याचिकाकर्ता ने बड़े धार्मिक आयोजनों, जैसे माघ मेला, के दौरान राज्य अधिकारियों और धार्मिक नेताओं के बीच समन्वय के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने और साधुओं-बटुकों की गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की थी।

माघ मेला 3 जनवरी से शुरू होकर 15 फरवरी को महाशिवरात्रि तक चला और इसका आयोजन उत्तर प्रदेश सरकार की देखरेख में किया गया।

विवाद मौनी अमावस्या के पवित्र स्नान पर्व के दौरान शुरू हुआ, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पारंपरिक पालकी जुलूस के साथ संगम की ओर जाने का प्रयास कर रहे थे।

प्रयागराज प्रशासन ने भारी भीड़ और नो-व्हीकल जोन नीति का हवाला देते हुए सुरक्षा कारणों से जुलूस को रोक दिया। इसके बाद स्वामी के शिष्यों और पुलिसकर्मियों के बीच झड़प हुई, जिससे मारपीट के आरोप लगे।

विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरना दिया और प्रशासन से माफी की मांग करते हुए कथित तौर पर अनशन कर दिया था।

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