पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की संख्या पिछले कई वर्षों में तेजी से घटी है। इसके पीछे कारण रहे हैं, हत्या, जबरन धर्मांतरण और पलायन। कई लोगों ने भारत में शरण ली। लेकिन हिंदुओं की तरह ही पाकिस्तान के ईसाई समुदाय की स्थिति भी चिंताजनक है। ईशनिंदा के आरोपों में हत्याएं, ईसाई लड़कियों के अपहरण, बलात्कार और हमले जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
11 अप्रैल 2026 को पंजाब प्रांत के ननकाना साहिब जिले के शाहकोट में 25 वर्षीय ईसाई महिला के साथ कथित तौर पर स्थानीय ठेकेदार फैजान मेहबूब रहमानी और उसके साथी ने बलात्कार किया।
5 अप्रैल 2026 को पंजाब के गुजरांवाला जिले में सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी कैथोलिक चर्च की ईस्टर जुलूस के दौरान एक ट्रक भीड़ में घुस गया, जिससे 60 लोग घायल हुए।
4 मार्च 2026 को सरगोधा जिले में 21 वर्षीय ईसाई मजदूर मार्कस मसीह की उसके नियोक्ताओं द्वारा हत्या कर दी गई।
26 मार्च 2026 को लाहौर में इफ्तिखार मसीह की मौत को आत्महत्या बताने की कोशिश की गई।
27 मार्च 2026 को फैसलाबाद में 15 वर्षीय ईसाई लड़की सिदरा बीबी का अपहरण कर लिया गया।
4 मार्च 2026 को जारी रिपोर्ट में यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) ने पाकिस्तान को “विशेष चिंता वाले देशों” की सूची में बनाए रखने की सिफारिश की। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की।
पाकिस्तान में ईसाई आबादी लगभग 1.3% है और वे अक्सर सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों में गिने जाते हैं।
“वर्ल्ड वॉच लिस्ट 2026” के अनुसार, ईसाइयों पर अत्याचार के मामलों में पाकिस्तान 8वें स्थान पर है। देश में ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग बढ़ रहा है, जिनका इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी, आर्थिक लाभ और धार्मिक भेदभाव के लिए किया जाता है। इन कानूनों के तहत केवल आरोप के आधार पर गिरफ्तारी हो जाती है।
ईसाई समुदाय को जमीन कब्जाने की घटनाओं का भी सामना करना पड़ता है। कई बार धर्मनिंदा के आरोप लगाकर उनकी संपत्तियों पर कब्जा कर लिया जाता है और उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर किया जाता है।
ईसाई लड़कियां जबरन धर्मांतरण और विवाह का शिकार बनती हैं। 2021 से 2024 के बीच कम से कम 137 मामलों में नाबालिग लड़कियों का जबरन धर्मांतरण हुआ। अप्रैल 2026 में 13 वर्षीय मारिया शाहबाज के मामले ने बड़ा विवाद खड़ा किया, जब अदालत ने उसका विवाह वैध माना।
पाकिस्तान में ईसाइयों को सामाजिक भेदभाव और अपमानजनक व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है। उन्हें नीची जाति के नामों से पुकारा जाता है और शिक्षा, रोजगार तथा दैनिक जीवन में भेदभाव झेलना पड़ता है।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान में ईसाई समुदाय के खिलाफ अत्याचार एक गहरी समस्या बन चुका है, जिसमें कानूनों का दुरुपयोग, सामाजिक असहिष्णुता और भीड़ हिंसा शामिल हैं। राज्य की प्रतिक्रिया अक्सर कमजोर और देर से होती है, जिससे न्याय की उम्मीद और भी कम हो जाती है।
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