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Sunday, January 18, 2026
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पित्तृसत्ता को नहीं कुटंबव्यवस्था को मिटाना चाहती है Mrs. !

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भारत ऐसे लोगों का देश है जहां सिनेमा को सीरयस लेने का कल्चर बनाया गया है। इसके फायदे ये है की समाज तक अगर कोई पॉजिटिव मैसेज पहुंचाना हो, तो कम समय में पहुंचाया जा सकता है, महंगा होगा लेकीन दिमाग में मैसेज छप जाएगा, लेकीन इसी के विपरीत अगर समाज को कोई नेगेटीव मैसेज जाना हो तो वो भी लोगों के दिमाग़ में छप सकता है।

एक फिल्म आई है, छावा! इसनें सिनेमाघरों में आग लगा रखी है। इस ऐतिहासिक फिल्म ने आज 10 वे दिन 330 करोड़ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन का आंकड़ा छू लिया है। छत्रपति संभाजी महाराज की जीवनी पर बनी यह फिल्म उनके संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान को याद दिलाती है। यह फिल्म इतिहास के उन सभी पन्नों को खोलती है, जिन्हें NCERT से लेकर सभी स्कुल बोर्ड्स ने जान बूझकर छिपाया था। यह फिल्म लोगों को उस राजा से मिलवाती है जो मुग़लों को अपनी मौत से भी खौफ देकर गया। इससे हम पॉजिटिव मैसेज इसीलिए ले सकते है क्योंकि इसमें हमारे पूर्वजों के बलिदान को, हमें ऐसे दौर में बताया जा रहा है, जहां संघर्ष का स्वरुप स्थानिक न होकर वैश्विक हो चूका है। इस फिल्म से त्याग और बलिदान के साथ ही संघर्ष की प्रेरणा भी मिलती है।

वहीं दूसरी फिल्म है मिसेस! इस फिल्म में नायिका, अरेंज मैरेज के दौरान सपने सजाती है, लेकीन उसकी अपेक्षाऐं पति के घर में आकर भंग हो जाती है। ये फिल्म एक मलयाली मूवी The Great Indian Kitchen से इंस्पायर होकर बनाई गई है, जो की फेमिनिस्ट एंगल दिखाती है, शादी के रिश्ते में नायिका के संघर्ष को दिखाती है। कैसे उसके पति और ससुर उसे काम वाली की तरह नचाते है, उससे घर के काम की अपेक्षा रखते है, लेकीन इस फिल्म की नायिका डांसर बनना चाहती है। उसे फेमस होना है, मगर उसका पेट्रीआरकल पति उसे मना कर देता है और आखिर में संघर्षसे थक-हारकर नायिका पति को छोड़ती है और अपने करियर पर आगे बढ़ती है। 

दोस्तों जैसे कहते है की किताबें समाज का आईना होती है, वैसे भारत के केस में करन जोहर की स्टूडेंट ऑफ़ द इयर जैसी फिल्मों को छोड़कर फिल्मों को भी समाज का आईना कहना होगा। इसीलिए अगर फिल्में समाज का वो हिस्सा दिखा रहीं है जहां अन्याय, पतन और अधिकारों का हनन है तो उन्हें समाज का वो हिस्सा भी दिखाना चाहिए, जहां न्याय है और अधिकारों की रक्षा भी हो रही है। मिसेस फिल्म में इसी का अभाव नज़र आता है, नायिका को उसका पति इतना दबाता है की वो अपने अधिकारों के लिए उठकर संघर्ष करे इसके बजाए वो पति से अलग हो जाती है।

दिक्कत यही है, की इस फिल्म की तरह शोषित महिलाओं की कहानी एक लक्षणीय संख्या में होगी, लेकीन जो संघर्ष फिल्म दिखाना चाहती है वो पुरुष और स्त्री के बीच का संघर्ष है केवल नायिका का नहीं। जहां भारत में डिवोर्स के रेट्स बढ़ रहें है। जहां डिवोर्स के चलते पुरुषों के आत्महत्या की ख़बरें लगातार आरहीं है, वहां स्त्री-पुरुष संघर्ष की आग में तेल डालने वाली ये फिल्म महिला को पति को छोड़ने की सलाह देती है। 

हमें इस फिल्म के निर्माताओं और फिल्म के चाहने वाले दर्शकों को यह बताने में कोई पीड़ा नहीं की जो संघर्ष इस फिल्म की नायिका गुजर रही है उतना, या कहो उससे अधिक संघर्ष हमारी माएं कर चुकी है या फिर कर रही है। गांव की महिलाऐं तो शहर की महिलाओं के मुकाबले औरभी चुनौतीपूर्ण अवस्था में होती है, लेकीन अगर आप उन्हें यह फिल्म दिखाने के बजाए परसनली ये बताएं की आप अपने पति को छोड़ दो वो आप के घर के पेट्रिआर्कि है, वो गांव की महिला घर के छत से बांस ना निकाले तो बोलना। उस महिला का पति के साथ रिश्ते में बने रहने का कारण यह नहीं है की वो महिला कम पढ़ी-लिखी है, गंवार है, पति के बाद उसे संभालने वाला कोई नहीं होगा। उसका कारण ये है की वो समझती है उसकी शादी हो चुकी है, और उसकी शादी को निभाकर सभी संघर्षों का सामना कर, वो रिश्ते को बनाए रखेगी यह उसके गौरव और आत्मसम्मान की बात है।

हर फिल्म संघर्ष के आधार पर बनी होती है, की कैसे नायक या नायिका संघर्ष में कैसे फंसते है और संघर्ष पर जीत कैसे पाते है। संघर्ष से उभरकर जीत को चूमना ही असली कहानी होती है। पर मिसेस फिल्म में महिला और पुरष के संघर्ष में पुरुष डोमिनैंस कोही संघर्ष बनाया है।

रिश्तों में जब बात डोमिनैंस की लायी जाती है तो एक शोषित और एक शोषणकर्ता भी दिखाया जाएगा। यानी एक पुरुष जो पति है वो शोषणकर्ता है और जो महिला है यानी पत्नी है वो शोषित है, पीड़ित है। भारत में ये बड़ी समस्या इसीलिए है की लोग इस फिल्म को देखकर दिमाग भ्रष्ट करवा लेंगे।  मुद्दा अगर फिल्म तक था तो भी ठीक था, लेकीन कुछ लोगों ने इस फिल्म को चर्चा का विषय बनाने की कोशीश कर रहें है। लोगों में मीम से लेकर बड़े बड़े आर्टिकल तक सब कुछ कर लिया गया है। यह वो लोग है जो चाहते है की समाज में फिल्म की चर्चा करना चाहते है, चर्चा हो तो फिल्म हिट हो। फिल्म हिट होगी इसीलिए चर्चा हो ये बात भी हम मान लेते, लेकीन इन चर्चाओ को लोगों में छोड़ाही ऐसे जा रहा है की महिला और पुरष के बीच के संघर्ष की चर्चा हो।यह बिलकुल वोक फेमिनिस्ट अजेंडे के तहत किया जा रहा है। 

ध्यान दें वोक फैमिनिस्ट अजेंडे से दिक्कत यही है की इनसें वो ही लोग जुड़ते है जिन्हें मानसिक दिक्कत है, जो समाज व्यवस्था को, और सबसे महत्वपूर्ण कुटुंब व्यवस्था को ध्वस्त करना चाहते है। कुटुंब व्यवस्था को ध्वस्त करना, लोगों में स्वैराचार, अहंकार का पोषण करना इस अजेंडे का मुख्य उद्देश्य है और यह भी एक वैश्विक साजिश का हिस्सा है। पुरुष और स्त्रिया सालों से एक दूसरे के लिए पूरक रहें हो, सम्यक रहें हो लेकीन इन दोनों के बीच एक शोषित और एक शोषणकर्ता निर्माण कर आग बनाए रखना यह वैश्विक साजिश के तहत किया जा रहा है। इसी आग से लोगों का मन कुटुंब व्यवस्था से उठ जाएगा और एक बार भारत में कुटुंब व्यवस्थाएं ध्वस्त  हुई तो भारत को अराजक ताकतों के वर्चस्व से कोई नहीं बचा सकता।

जितना काम ये नायिका फिल्म में संघर्ष के रूप में कर रही है उतना हमारी माएं हमसे प्रेम में ही कर जाती है.. वो भी हरदिन। अगर इस फिल्म ने एक ही रिश्ते के दो बिंदुओं को आपस में भिड़वाने के बजाए संघर्ष के बाद मिलाया होता, या फिर फिल्म में नायिका को अंत में सम्मान दिलवाया होता तो उसे हम समाज के लिए एक बेहतर स्टोरी के नज़र से देखते। लेकीन ये फिल्म एक पद्धति की अराजक मानसिकता का ही पोषण करती है, फिर वो चाहे पुरष पात्रों से आता हो या फिर महिला पात्र से।

दर्शकों से हमारी मांग होगी की इस फिल्म को केवल एंटरटेनमेंट के नजीरये से देखे…लेकीन इस फिल्म से कोई खास एंटरटेमेंट की अपेक्षा रखे बिना। इस फिल्म को देखकर ये सोचना बंद करें की आप के पिता एक पैट्रिआर्क है और आपकी मां से काम करवाकर उन्हें परेशान कर रहें है…पापा की बेल्ट का पता नहीं पर हो सकता है मां का बेलन आपके पीठ की चमड़ी न उधेड़ दे। मिसेस फिल्म से ले देकर बस इतनी ही सीखें की हर रिश्ते की कदर करनी चाहिए, सभी सन्मान पात्र है चाहे वो पुरुष हो या महिला…इस बात को समझें की जीवन में हर रिश्ते को उतार-चढाव से संघर्षों से गुजरना पड़ता है, तब जाकर वो मजबूत होते है। बाकी सोशल मीडिया पर जो की-बोर्ड वारियर्स बनकर घूम रहें है उनके लिए भी भी इस फिल्म की रिच को बूस्ट करने से बेहतर अपनी माँ और बहन का हाथ बटाना चाहिए क्योंकि सोशल मीडिआ पर कोई पेट्रिआर्की स्मैश नहीं होती, घर से होती है।

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