चीन एक द्विपक्षीय विवाद में घुसकर भारत के सबसे कमजोर गलियारे के पास अपनी मौजूदगी पक्की कराना चाहता है। दिल्ली को अब बहुत ही संभलकर अपनी रणनीतिक फैसले लेने होंगे। 22 फरवरी को चीन ने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि वह बांग्लादेश में लंबे समय से लंबित ‘तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना’ को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह घोषणा बांग्लादेश में तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के महज एक हफ्ते के भीतर आई है। चीन की दो देशों के ‘वॉटर पॉलिटिक्स’ में घुसकर आखिर क्या हासिल करना चाहता है, और क्यों सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी भारत की ‘चिकन नेक’ के पास चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय है यही हम समझेंगे।
बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान और चीनी राजदूत याओ वेन के बीच हुई मुलाकात के बाद चीन ने साफ कर दिया है कि वह तीस्ता परियोजना पर जल्द से जल्द काम शुरू करना चाहता है। चीनी राजदूत ने संकेत दिए है की बीजिंग नई सरकार के साथ अपने रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए बेताब है और यह करने के लिए चीन पानी की तरह पैसा बहाने के लिए तैयार है। ऐसा कर चीन बांग्लादेश में एक स्थायी जगह पाना चाहता है, जिसके जरिए और वह भारत पर भीतर से निगरानी रख सके।
दरअसल तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट (TRCMRP एक रिवर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट है, जिसे उत्तरी बांग्लादेश में मौसमी पानी की दिक्कतों को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। इसका कुल खर्चा $1 बिलियन अमेरिकी डॉलर्स से अधिक होने वाला है। इस “मेगा प्रोजेक्ट” में नदी की गहराई और नेविगेबिलिटी बढ़ाने के लिए नदी के तल के लगभग 110 km हिस्से की ड्रेजिंग कर गाद निकाला जाएगा, नदी के पानी कटाव को कंट्रोल करने के लिए 100 km से ज़्यादा लंबे तटबंध बनाया जाएगा, और सूखे मौसम में मानसून का पानी स्टोर करने के लिए नहरों और जलाशयों का एक नेटवर्क बनया जाएगा। इस प्रोजेक्ट में सैटेलाइट शहर, सोलर पार्कों और इंडस्ट्रियल ज़ोन के लिए बेस बनाया जाएगा। बांग्लादेश के पास खर्च के लिए इतना पैसा नहीं है, इसीलिए चीन उसे अपने कर्ज के ट्रैप में फंसाना चाहता है, जैसे पाकिस्तान को CPEC के कर्जे तले दबाया गया है। तीस्ता प्रोजेक्ट को अब औपचारिक रूप से चीन के बीआरआई (BRI) का हिस्सा बनाया जा रहा है, जिससे बांग्लादेश के इंफ्रास्ट्रचर में चीन का दखल बढ़ जाएगा।
कागज पर तो यह परियोजना नदी के तल की ड्रेजिंग, तटबंधों की मजबूती और बाढ़ नियंत्रण जैसे विकास कार्यों की बात करती है। लेकिन रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह इससे कहीं ज्यादा है। इस बड़े पैमाने की परियोजना के लिए बांग्लादेश के तीस्ता बेसिन में चीनी इंजीनियर्स, ठेकेदार, तकनीकी उपकरणों और निगरानी स्टेशन की लंबे समय तक मौजूदगी होगी।
तीस्ता नदी भारत के सिक्किम से निकलती है, पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में, जो सीधे भारतीय सीमा से सटा हुआ है, चीन की सक्रियता भारत के लिए खतरे की घंटी है।
भारत की असली चिंता भूगोल को लेकर है। तीस्ता का निचला बेसिन भारत के स्ट्रैटेजिक ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के बेहद करीब है। यह केवल 20 किलोमीटर चौड़ा जमीन का एक हिस्सा है जो पूरे उत्तर-पूर्वी भारत को शेष देश से जोड़ता है। इसे भारत की ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यदि चीनी कंपनियां और उनके तकनीकी कर्मी इस क्षेत्र में लंबे समय तक डेरा डालते हैं, तो वे भारत के इस सबसे संवेदनशील कॉरिडोर की निगरानी कर सकते हैं। इसके अलावा, नदी प्रबंधन के नाम पर की जाने वाली मैपिंग और डेटा संग्रह का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। उत्तरी बांग्लादेश में लालमुनीरहाट एयरबेस का विकास भी भारत की चिंताएं बढ़ा रहा है। तीस्ता प्रोजेक्ट के नाम पर चीन के हाथ टोपोग्राफी से लेकर, नदी के बहाव, भारत के सबसे संवेदनशील कॉरिडोर की पहुंच और सेना चौकियों के निगरानी की चाबी लग चुकी है।
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का विवाद 1971 से चला आ रहा है। 1983 में एक अस्थायी व्यवस्था हुई थी, लेकिन कोई स्थायी संधि नहीं बन सकी। 2011 में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम समझौता होने वाला था, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बॅनर्जी के विरोध के कारण मुद्दा सुलझने के बजाए उलझ गया, जो दोनों देशों के दरम्यान खाई बना गया। ममता बैनर्जी के कड़े विरोध के कारण इसे टालना पड़ा। ममता बनर्जी सरकार का तर्क है कि तीस्ता में पानी की कमी से उत्तर बंगाल के किसानों की सिंचाई और बिजली उत्पादन पर बुरा असर पड़ेगा। भारत के लिए दुविधा यह है कि यदि वह पानी साझा करने में देरी करता है, तो बांग्लादेश चीन की गोद में बैठ जाएगा। और यदि वह समझौता करता है, तो पश्चिम बंगाल में घरेलू राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा।
इसीलिए नई दिल्ली को कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे, चीन की स्थिती को मजबूत नहीं होने देना, और इसके लिए पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को नारज न करना एक संवेदनशील, जोखिम भरा काम है। हालाँकि चीन का इस वक्त सक्रिय होना बताता है कि वह बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन को एक सुनहरे अवसर के रूप में देख रहा है। हमें आने वाले महीनों में कुछ खास चीजों पर नजर रखनी होगी, क्या ढाका आधिकारिक तौर पर तीस्ता प्रोजेक्ट के लिए चीन को प्राथमिकता देता है ? क्या तारिक रहमान अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए बीजिंग जाते हैं? क्या बांग्लादेश में वाटर जस्टिस नाम से भारत के खिलाफ फैलाया जाने वाला नैरेटिव रोका जा सकता है ?
क्योंकि तीस्ता का मुद्दा अब केवल पानी के बंटवारे या हाइड्रोलॉजी तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी की परीक्षा बन चुका है। दौरान दिसंबर 2026 में गंगा जल संधि का भी नवीनीकरण होना है, ऐसे में बांग्लादेश इस मुद्दे को भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
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