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Wednesday, January 14, 2026
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“आखिर क्या था पश्चिम बंगाल का शिक्षक भर्ती घोटाला, कैसे हुआ खुलासा?”

ओएमआर शीट में गड़बड़ी की गई, मेरिट लिस्ट में हेरफेर हुआ और पदों की खुलेआम बिक्री

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भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा संदेश देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 3 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में 2016 की भर्ती प्रक्रिया के तहत हुई 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मियों की नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को “सिस्टेमेटिक रूप से भ्रष्टाचार” बताया। यह फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के आदेश की पुष्टि करता है और राज्य सरकार को तीन महीनों के भीतर नई, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश देता है।

यह निर्णय उन हज़ारों लोगों के लिए एक बड़ा झटका है जो अब तक शिक्षक पदों पर कार्यरत थे या नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस मुद्दे को “मानवता का सवाल” बताते हुए पीड़ितों के प्रति सहानुभूति जता रहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में सहानुभूति नहीं, बल्कि न्याय प्राथमिकता है।

यह घोटाला 2014 में शुरू हुआ, जब पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) ने राज्य संचालित और सहायता प्राप्त स्कूलों में 24,640 पदों के लिए विज्ञापन निकाला। 2016 में SLST (राज्य स्तरीय चयन परीक्षा) आयोजित की गई, जिसे उस समय के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की देखरेख में संपन्न किया गया। परीक्षा में 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने आवेदन किया, लेकिन परिणामों में जो हुआ वह राज्य के इतिहास में काला अध्याय बन गया। अंतिम मेरिट लिस्ट में 25,753 नियुक्तियाँ दर्शाईं गईं, जो विज्ञापित पदों से 1,000 से अधिक थीं। इसके बाद ही धांधली और रिश्वतखोरी की आशंकाएँ तेज़ हो गईं।

2017 में असफल लेकिन टॉपर उम्मीदवारों ने मेरिट लिस्ट में कई अनियमितताओं को उजागर किया। बाद में आयोग ने बिना कोई कारण बताए मेरिट लिस्ट को रद्द कर दिया। सिलीगुड़ी की रहने वाली बबिता सरकार नाम की अभ्यर्थी बेटिंग लिस्ट में 20 नंबर पर थीं। लेकिन बाद में वेटिंग लिस्ट में उनका स्थान 20 से बदलकर 21 कर दिया गया।

इस लिस्ट में 20वें नंबर पर अंकिता अधिकारी का नाम शामिल कर दिया गया। बबिता के मुताबिक 2016 में हुई भर्ती परीक्षा में उन्हें 77 अंक मिले थे और अंकिता को 61 अंक मिले थे। कम नंबर होने के बाद भी आयोग ने अंकिता को कूच बिहार जिले के मेखलीगंज के इंदिरा उच्च विद्यालय में राजनीति विज्ञान के शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। दरअसल अंकिता ममता सरकार के शिक्षा राज्यमंत्री मंत्री परेश चंद्र अधिकारी की बेटी थी।

जिनके अंक अधिक थे, उनके नाम लिस्ट से गायब थे, जबकि कम अंकों या संदिग्ध उम्मीदवार नियुक्त हो चुके थे। सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुप्स और RTI आवेदन ने धीरे-धीरे इस घोटाले की परतें खोलनी शुरू कीं। कुछ उम्मीदवारों ने 5 से 15 लाख रुपये तक की रिश्वत लेकर नौकरी मिलने की बात बताई।

संदीप प्रसाद, सबीना यास्मीन और सेताब उद्दीन जैसे उम्मीदवारों ने मेरिट लिस्ट और प्रदर्शन की तुलना कर घोटाले के सबूत इकट्ठा किए। ‘रैंक जंपिंग’, ओएमआर शीट में हेरफेर, और कैश-फॉर-जॉब के आरोप पुख्ता होते गए। इन व्हिसलब्लोअर्स ने कानूनी लड़ाई शुरू की और जनता के बीच इस घोटाले को लेकर जागरूकता बढ़ाई।

2017 में ये उम्मीदवार, अधिवक्ता फिरदौस समीम की मदद से कलकत्ता हाईकोर्ट पहुँचे। उन्होंने आरोप लगाया कि ओएमआर शीट में गड़बड़ी की गई, मेरिट लिस्ट में हेरफेर हुआ और पदों की खुलेआम बिक्री हुई। 2021 तक, ठोस दस्तावेज़ी सबूतों के साथ ये याचिकाकर्ता अदालत में थे।

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI जांच का आदेश दिया। जांच में पाया गया कि कई ओएमआर शीट जलाई गईं, RTI में गलत जानकारी दी गई, और भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुआ। जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में 2022 में सुनवाई हुई, जिसके बाद 22 अप्रैल 2024 को हाईकोर्ट ने सभी 25,753 नियुक्तियाँ रद्द कर दीं और वेतन की वसूली पर 12% ब्याज लगाने का आदेश दिया।

सीबीआई ने अप्रैल-मई 2022 में पार्थ चटर्जी से पूछताछ की, जो 2014 से 2021 तक ममता बनर्जी सरकार में शिक्षा मंत्री थे। चटर्जी से पूछताछ के बाद सीबीआई ने इस मामले में धन शोधन की शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद इस मामले  प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 2022 में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। 23 जुलाई 2022 को पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया गया, जब उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी के ठिकानों से ₹20 करोड़ नकद और सोना बरामद हुआ। इसके बाद ₹230 करोड़ की संपत्ति जब्त हुई, जिसका संबंध शांति प्रसाद सिन्हा और प्रसन्न कुमार रॉय जैसे दलालों से जोड़ा गया। यह गिरफ्तारी तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में भूकंप साबित हुई।

3 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि 2016 की SLST भर्ती पूरी तरह से भ्रष्ट थी, और कोई भी सहानुभूति न्याय और मेरिट प्रणाली की जगह नहीं ले सकती। अदालत ने तीन महीने के अंदर नई पारदर्शी भर्ती की समयसीमा तय की है।

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