वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 1 फरवरी को बजट 2026 पेश करने से पहले भारत का नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत दे रहा है। उद्योग से जुड़े हितधारकों का कहना है कि अब सफलता केवल नई क्षमता जोड़ने से नहीं, बल्कि बिजली प्रणाली की बुनियादी संरचना, जिसमें ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा भंडारण, ग्रिड स्थिरता, डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति और जोखिम न्यूनीकरण इन सभी को दुरुस्त करने पर निर्भर करेगी।
पिछले एक दशक में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेज़ी से विस्तार किया है। देश 262 गीगावॉट से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित क्षमता हासिल कर चुका है और 2030 तक 500 गीगावॉट तथा 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन जैसे-जैसे बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ रही है, पावर सिस्टम की संरचनात्मक कमजोरियां भी सामने आने लगी हैं।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान जैसे उच्च क्षमता वाले राज्यों में नवीकरणीय बिजली की कटौती (कर्टेलमेंट) की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका कारण अपर्याप्त ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड स्थिरता से जुड़ी चिंताएं हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी से जुड़ी चुनौतियों ने मौजूदा वित्त वर्ष में प्रोजेक्ट अवॉर्ड गतिविधियों और पिछले एक वर्ष में नीलाम की गई कुछ क्षमता के लिए डिस्कॉम के साथ पीएसए (पावर सेल एग्रीमेंट) साइनिंग को प्रभावित किया है।”
नवीकरणीय कर्टेलमेंट तब होता है जब सौर या पवन संयंत्र उपलब्ध होने के बावजूद उत्पादन घटाने को मजबूर होते हैं, क्योंकि ग्रिड में पर्याप्त ट्रांसमिशन या लचीलापन नहीं होता। इससे परियोजनाओं की आय प्रभावित होती है, निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता है और सस्ती स्वच्छ बिजली बर्बाद होती है।
एलएनके एनर्जी के सह-संस्थापक वरुण कराड ने कहा, “मौजूदा प्रोत्साहनों से बड़ी क्षमता जोड़ने और घरेलू विनिर्माण को गति मिली है, लेकिन निवेशकों के लिए दीर्घकालिक पूंजी तभी आएगी जब नीतिगत स्थिरता और भुगतान अनुशासन सुनिश्चित होगा।” उन्होंने चेतावनी दी, “अगर सरकार ग्रिड रेज़िलिएंस और दीर्घकालिक स्टोरेज पर ध्यान नहीं देती, तो नवीकरणीय ऊर्जा के अवशोषण की एक सीमा आ सकती है।”
ऊर्जा भंडारण, खासकर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और पंप्ड हाइड्रो, बजट 2026 के केंद्र में रहने की उम्मीद है। हालांकि केंद्र ने सीमित बैटरी क्षमता के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) की घोषणा की है, लेकिन उद्योग का कहना है कि अब पैमाना और गति दोनों जरूरी हैं। एक अधिकारी ने कहा, “नीति में निरंतरता और उच्च बजटीय आवंटन, खासकर VGF जैसे उपायों के जरिए, बैटरी स्टोरेज में अधिक पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करेंगे।” साथ ही यह भी जोड़ा गया कि इंटर-स्टेट और इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन परियोजनाओं का समय पर क्रियान्वयन बेहद अहम है।
राज्य स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों की भुगतान देरी अब भी निवेशकों के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है। उद्योग का मानना है कि वितरण सुधारों और स्मार्ट मीटरिंग के लिए अधिक बजटीय समर्थन से डिस्कॉम की नकदी स्थिति सुधर सकती है।
एक वरिष्ठ प्रतिनिधि के अनुसार, “ट्रांसमिशन की पर्याप्तता और लंबित पीएसए पर हस्ताक्षर निकट भविष्य के अहम निगरानी बिंदु हैं।”
उद्योग जगत का कहना है कि बजट 2026 को केवल बड़े लक्ष्य नहीं, बल्कि सिस्टम की ‘प्लंबिंग’ सुधारने की कसौटी पर परखा जाएगा। तेजी से क्षमता जोड़ने के दौर के बाद भारत का स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण अब उस चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां विश्वसनीयता, भंडारण और एकीकरण उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना उत्पादन। अगली छलांग इस बात से तय होगी कि भारत कितनी कुशलता से बिजली को ट्रांसमिट, स्टोर और आर्थिक रूप से उपयोग में ला पाता है।
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