भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अब इस मुद्दे पर देश के उद्योगपतियों और अर्थशास्त्रियों से प्रत्यक्ष संपर्क की तैयारी शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार, RSS प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर आगामी दिनों में एक गोलमेज बैठक में इन नेताओं के साथ व्यापार समझौते के संभावित प्रभावों पर चर्चा कर सकते हैं।
यह बैठक नीति अनुसंधान एवं प्रशासन केंद्र (CPRG) द्वारा आयोजित की जाएगी और इसका मुख्य फोकस कृषि और डेयरी क्षेत्रों पर होगा — जो दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता में सबसे संवेदनशील विषय बने हुए हैं। भारत अमेरिका के साथ किसी भी समझौते में घरेलू किसानों और डेयरी उद्योग के हितों की रक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।
CPRG ने अब तक मुंबई और दिल्ली में अलग-अलग क्षेत्रों पर केंद्रित दो गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया है। इनमें व्यापार समझौते के संभावित प्रभावों पर गहन विमर्श किया गया। बीते महीने मुंबई में आयोजित बैठक में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के एमडी और सीईओ आशीष चौहान सहित कई प्रमुख उद्योग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
मुंबई बैठक के बाद आंबेकर ने कहा था,“भारत ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का स्वागत किया है, लेकिन अब स्पष्टता और मजबूती के साथ अपने हितों को स्थापित करना बेहद ज़रूरी है। अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अपनी व्यापारिक स्थिति पर रणनीतिक रूप से बातचीत करना उचित है।”
हाल ही में दिल्ली में हुई एक और बैठक में उन्होंने भारत की वैश्विक आर्थिक क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत को दुनिया से निर्भरता नहीं, बल्कि मजबूती की स्थिति से जुड़ना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि RSS किसी भी व्यापार समझौते में भारत के दीर्घकालिक हितों की रक्षा को प्राथमिकता देगा।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते में कृषि, डेयरी, डिजिटल व्यापार और बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे विषयों पर चर्चा चल रही है। ऐसे में RSS का इस वार्ता में रुचि लेना दर्शाता है कि संगठन अब नीतिगत मामलों में भी प्रत्यक्ष संवाद और भागीदारी होगा, ताकि सरकार की दिशा में सामाजिक और आर्थिक संतुलन बना रहे।
अगली बैठक में कृषि क्षेत्र के अर्थशास्त्रियों और उद्यमियों से सीधा संवाद होगा, जिसमें अमेरिका से होने वाले संभावित समझौते का स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और उत्पादन पर असर पर चर्चा की जाएगी। इस पहल को केंद्र सरकार की व्यापार नीति को लेकर आंतरिक संरेखण (internal alignment) के रूप में देखा जा रहा है।
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