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Monday, October 26, 2026
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साइबर धोखाधड़ी: भोपाल में वकील ने ‘आतंकी फंडिंग’ में नाम की धमकी सुनकर की आत्महत्या !

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भोपाल में 68 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता शिव कुमार वर्मा की आत्महत्या ने पूरे शहर में गहरा सदमा पैदा कर दिया है। शवकुमार वर्मा ने 1984 भोपाल गैस त्रासदी के दौरान कई पीड़ितों के अंतिम संस्कार स्वयं किए थे। सोमवार (24 नवंबर) देर शाम वरिष्ठ वाकिल ने अपने जहांगिराबाद स्थित आवास में जीवन समाप्त कर लिया। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि वे साइबर अपराधियों द्वारा झूठे आतंकी लिंक और डिजिटल अरेस्ट की धमकियों के शिकार बने थे।

पुलिस के अनुसार, वर्मा अपने घर में अकेले थे। उनकी पत्नी दिल्ली में बेटी के पास थीं, जबकि बेटा पुणे में कार्यरत है। शाम भर पत्नी के कॉल का जवाब न मिलने पर उन्होंने उसी परिसर में रहने वाले किरायेदार को फोन किया। किरायेदार जब घर पहुंचे, तो उन्होंने वर्मा को फंदे से लटका पाया और तुरंत पुलिस को सूचना दी। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

मौके से पुलिस को एक हस्तलिखित सुसाइड नोट मिला, जिसमें वर्मा ने मानसिक उत्पीड़न की पूरी कहानी लिखी थी। उन्होंने बताया कि एक अज्ञात कॉलर ने उन्हें धमकी दी कि उनका नाम दिल्ली के लाल किले के पास किसी आतंकी साजिश में सामने आया है। कॉलर ने दावा किया कि HDFC बैंक में उनके नाम से एक फर्जी खाता खोला गया है और उसी खाते से पहलगाम आतंकी हमले के आरोपी आसिम जोजी को पैसा भेजा गया।

नोट में उन्होंने लिखा,“मैं अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहा हूँ। किसी ने मेरे नाम से HDFC बैंक में खाता खोलकर पहलगाम हमले के आतंकी आसिम जोजी को पैसे भेजे हैं। मैं ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहलाने का कलंक नहीं झेल सकता।” उसी नोट में उन्होंने 41 वर्ष पहले भोपाल गैस कांड के मृतकों के अंतिम संस्कार कराने की बात भी लिखी, जो इस त्रासदी को और पीड़ादायक बना देती है।

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जहांगिराबाद पुलिस का कहना है कि यह मामला डिजिटल अरेस्ट स्कैम का एक गंभीर उदाहरण है। इस स्कैम में साइबर अपराधी पीड़ित को लगातार कॉल और धमकियों के जरिए मानसिक रूप से अलग-थलग कर देते हैं और उसे विश्वास दिलाते हैं कि वह किसी बड़े आतंकी मामले या ड्रग्स रैकेट से सम्बंधित मामले में फंसा है। एक अधिकारी ने बताया,“प्रारंभिक जांच से साफ है कि यह साइबर ठगों का काम है। वर्मा को फोन पर धमकाया गया और कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा गया।”

वर्मा का मोबाइल फोन और सुसाइड नोट फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिए गए हैं। पुलिस कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रेस और बैंक डिटेल्स की जांच कर रही है ताकि अपराधियों की पहचान की जा सके।

चौंकाने वाली बात यह है कि यह तीन हफ्तों में दूसरा मामला है, जब भोपाल के किसी वरिष्ठ अधिवक्ता को आतंकी फंडिंग के झूठे आरोपों में फंसाने की कोशिश हुई हो। 3 नवंबर को कोहे-फ़िज़ा क्षेत्र में एक अधिवक्ता को पुलवामा हमले की फंडिंग का झूठा आरोप लगाकर ठगा गया।

20 नवंबर को शाहपुरा में एक सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर से डिजिटल अरेस्ट के जरिए ₹68 लाख वसूले गए। एक अन्य मामले में एक रिटायर्ड PSU अधिकारी और उनकी पत्नी को कई दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर ₹65 लाख ठग लिए गए। इन घटनाओं ने पुलिस और साइबर सुरक्षा एजेंसियों को भारी दबाव में ला दिया है। फिलहाल पुलिस ने केस दर्ज कर व्यापक जांच शुरू कर दी है। आगामी दिनों में इस गिरोह के अन्य लिंक और राज्यों में फैले नेटवर्क का खुलासा होने की उम्मीद है।

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