करीब चार दशक बाद 1987 साकीनाका हमला मामले में आरोपी बरी

साक्ष्यों की कमी पर अदालत का फैसला

करीब चार दशक बाद 1987 साकीनाका हमला मामले में आरोपी बरी

After nearly four decades, the accused in the 1987 Sakinaka attack case was acquitted.

मुंबई की एक सत्र अदालत ने लगभग 37 वर्ष पुराने साकीनाका चाकू हमले के मामले में 58 वर्षीय आरोपी नासिर इब्राहिम दादन को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य पेश करने में विफल रहा, जिसके कारण आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित ए. लौलकर ने दादन को हत्या के प्रयास और गंभीर चोट पहुंचाने के आरोपों से मुक्त कर दिया। यह मामला 1987 से लंबित था और इस दौरान कई महत्वपूर्ण गवाहों की मृत्यु हो गई या उनका पता नहीं चल सका, जिससे मुकदमे की प्रक्रिया काफी प्रभावित हुई।

मामले के अनुसार, 30 सितंबर 1987 को साकीनाका इलाके में कुछ लोगों के एक समूह ने कथित तौर पर मनोर नायडू पर चाकू से हमला किया था। इसी घटना में सैय्यद आमिर और शंकर तायडे नामक दो अन्य व्यक्तियों पर भी हमला किया गया था, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पुलिस ने घटना के अगले दिन FIR दर्ज की और वर्ष 1988 में आरोपपत्र दाखिल किया।

हालांकि, मामला कई वर्षों तक लंबित रहा और मुकदमे की सुनवाई दशकों बाद शुरू हो सकी। इस दौरान दो आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि एक अन्य आरोपी कई वर्षों तक फरार रहा और बाद में गिरफ्तार किया गया। इस मामले में आरोप अगस्त 2025 में तय किए गए और फरवरी 2026 में ट्रायल शुरू हुआ।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला काफी कमजोर हो गया क्योंकि वह प्रमुख गवाहों को अदालत में पेश नहीं कर सका। सुनवाई के दौरान केवल पुलिस कांस्टेबल अमित चौधर का बयान दर्ज किया गया, लेकिन उनकी गवाही भी अभियोजन के आरोपों को मजबूत नहीं कर सकी।

अदालत ने यह भी कहा कि कांस्टेबल चौधरी की गवाही मुख्य रूप से सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी। न्यायालय ने जोर देते हुए कहा कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों वाले मामले में घायल पीड़ितों और शिकायतकर्ता की प्रत्यक्ष गवाही अत्यंत आवश्यक होती है, लेकिन अभियोजन पक्ष उन्हें अदालत में पेश करने में असफल रहा।

इसके अलावा अदालत ने यह भी पाया कि अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों को भी विधिवत रूप से साबित नहीं किया गया। चिकित्सा रिपोर्ट और फॉरेंसिक साक्ष्य को रिकॉर्ड पर विधिवत पेश नहीं किया गया, जबकि मामले की जांच करने वाले अधिकारी का भी बयान दर्ज नहीं कराया गया।

इन सभी कमियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “आरोपी के खिलाफ लगाए गए अपराध के आवश्यक तत्व किसी भी संभावित संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए हैं… विश्वसनीय साक्ष्य के बिना किसी अपराध को कानूनी रूप से कायम नहीं रखा जा सकता।”

अदालत ने इसके बाद नासिर इब्राहिम दादन को बरी करते हुए उनके जमानत बांड भी रद्द कर दिए। साथ ही फरार आरोपी के खिलाफ चल रही कार्यवाही को भी समाप्त कर दिया गया, यह कहते हुए कि मुकदमे को आगे जारी रखने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।

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