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2011 मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केस: मुंबई हाईकोर्ट ने 65 वर्षीय आरोपी कफील अहमद को दी जमानत

अभियोजन पक्ष 800 गवाहों को पेश करने का दावा करता है, लेकिन अब तक केवल 170 से अधिक गवाहों के बयान ही दर्ज किए गए हैं।

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मुंबई हाईकोर्ट ने मंगलवार(4 नवंबर) को 2011 के मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार 65 वर्षीय कफील अहमद मोहम्मद अयूब को जमानत दे दी। अदालत ने उन्हें एक लाख रुपये के मुचलके पर रिहाई की अनुमति दी है। अयूब पिछले 13 वर्षों से जेल में बंद  था। यह मामला 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए तीन सिलसिलेवार धमाकों से जुड़ा है, जिनमें 27 लोगों की मौत हो गई थी और 127 लोग घायल हुए थे। ये विस्फोट झवेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर कबूतरखाना इलाके में 10 मिनट के भीतर हुए, जिससे पूरे शहर में दहशत फैल गई थी।

अयूब को फरवरी 2012 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में हैं। अयूब ने 2022 में विशेष अदालत से जमानत की मांग की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और आर.आर. भोसले की खंडपीठ ने मंगलवार(4 नवंबर) को सुनवाई के दरम्यान अयूब राहत दी। अदालत का विस्तृत आदेश अभी जारी होना बाकी है। वर्तमान में अयूब मुंबई सेंट्रल जेल में बंद हैं।

इस मामले की जांच राज्य की एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने की थी। जांच एजेंसी का दावा है कि भारतीय मुजाहिदीन (Indian Mujahideen) संगठन ने इन हमलों की साजिश रची थी और इसका मास्टरमाइंड यासीन भटकल था।
एटीएस का कहना है कि अयूब और अन्य आरोपी युवाओं को भड़काकर आतंकी गतिविधियों में शामिल कर रहे थे और उनका संपर्क भटकल से था, जो अब भी फरार है।

अयूब की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मुबीन सोलकर ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को बिना पर्याप्त सबूतों के जेल में रखा गया है। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष 800 गवाहों को पेश करने का दावा करता है, लेकिन अब तक केवल 170 से अधिक गवाहों के बयान ही दर्ज किए गए हैं। सोलकर ने यह भी कहा कि अयूब ने कोई अपराध नहीं किया और उनके खिलाफ एकमात्र सबूत उनकी स्वीकृति (कबूलनामा) है, जो उन्होंने दबाव में दिया गया बताया।

इस मामले में कुल 11 आरोपी मुकदमे का सामना कर रहे हैं। मुख्य आरोपी यासीन भटकल के अलावा कई अन्य संदिग्ध अब भी फरार बताए जा रहे हैं। मामले की सुनवाई विशेष अदालत में चल रही है, लेकिन गवाहों की धीमी परीक्षा के कारण ट्रायल में देरी हो रही है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रहे आरोपी के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि जमानत का मतलब बरी होना नहीं है, और मुकदमे की सुनवाई जारी रहेगी।

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