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सोनम वांगचुक चाहते हैं कि लद्दाख नेपाल की तरह हो जाए: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में बयान

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लद्दाख के सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर केंद्र सरकार ने सोमवार (2 फरवरी)को सुप्रीम कोर्ट में सख्त रुख अपनाया। केंद्र का कहना है कि वांगचुक के सार्वजनिक भाषण उकसावे की श्रेणी में आते हैं, जिनमें अलगाववादी संदेश   हैं और जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं खासकर एक रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की पीठ वांगचुक की पत्नी गीतांजलि द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उनके पति की हिरासत को चुनौती दी गई है। सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत अदालत हिरासत आदेशों पर अपील के रूप में नहीं बैठती। पीठ के अनुसार, विचार का मुख्य प्रश्न यह है कि हिरासत के लिए दिए गए कारणों, आधारों और सामग्री का राष्ट्रीय सुरक्षा से तार्किक संबंध (नेक्सस) है या नहीं।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालत को अपनी संतुष्टि का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) इस निष्कर्ष पर पहुंचने में उचित रूप से संतुष्ट था या नहीं कि वांगचुक की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि हिरासत आदेश में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वांगचुक के भाषणों में हानिकारक गतिविधियों को भड़काने और सार्वजनिक शांति को बिगाड़ने की क्षमता थी।

मेहता ने अदालत को बताया कि वांगचुक ने युवाओं को उकसाने की कोशिश की और लद्दाख को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी परिस्थितियों की ओर धकेलने का संकेत दिया। उन्होंने इन देशों में हुए हिंसक आंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की बयानबाज़ी एक संवेदनशील सीमा क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।

केंद्र ने यह भी कहा कि हिरासत का आदेश पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए और समयबद्ध तरीके से चार घंटे के भीतर जारी किया गया। सॉलिसिटर जनरल के मुताबिक, एक डीआईजी ने वांगचुक से मुलाकात की, उन्हें उनके भाषणों के वीडियो क्लिप दिखाए गए और वांगचुक ने स्वीकार किया कि ये क्लिप प्रामाणिक हैं। केंद्र का तर्क है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर डीएम का संतोष उचित था।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह संकेत दिया कि वह हिरासत आदेश की वैधता को प्रक्रियात्मक और संवैधानिक मानकों पर परखेगी, न कि सामग्री की राजनीतिक व्याख्या करेगी। याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए तर्कों पर सुनवाई जारी है।

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