‘मध्यस्थ नहीं, बिचौलिया है पाकिस्तान’

कूटनीतिक सक्रियता बनाम वास्तविक प्रभाव

‘मध्यस्थ नहीं, बिचौलिया है पाकिस्तान’

'Pakistan is not a mediator, it is a middleman'

पाकिस्तान ईरान बनाम अमेरिका युद्ध में सीज़फायर कराने की डींगे हांकते हुए घूम रहा है। सीज़फायर के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सोशल मीडिया टीम से लेकर पाकिस्तानी डीजी आईएसपीआर की सोशल मीडिया टीमें  अपने देश के कूटनीतिक सक्रियता की पीठ थपथपाने में जुटे है। साथ ही इस पीठ थपथपाने के बड़बोलेपन में पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल्स भारत को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे है। और यही भारत के भाजपा सरकार विरोधी सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भी देखा जा सकता है। हालांकि पाकिस्तान के इस ‘मध्यस्थता’ सवालों के घेरे में है। पाकिस्तान खुद को एक प्रभावशाली मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, जबकि वास्तविकता में उसकी भूमिका सीमित और परोक्ष है।

‘मध्यस्थ’ या ‘बिचौलिया’

पाकिस्तान ने खुद को संघर्षरत पक्षों के बीच बातचीत कराने वाला देश दिखा रहा है। लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर कई महत्वपूर्ण बयान और पहलें बाहरी शक्तियों, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभाव में तैयार हुईं। विश्लेषकों का कहना है कि जब किसी देश को युद्धविराम जैसे अहम संदेश जारी करने से पहले दूसरे देशों की मंजूरी लेनी पड़े, तो उसकी मध्यस्थ  की भूमिका पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

पाकिस्तान का बिचौलिया का काम नया नहीं है। 1970 के दशक में रिचर्ड निक्सन और माओ त्से तुंग के बीच संपर्क स्थापित कराने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। हालांकि, इसके तुरंत बाद 1971 में पूर्वी पाकिस्तान संकट के दौरान स्थिति बिगड़ी और अंततः बांग्लादेश का गठन हुआ। इसे पाकिस्तान की रणनीतिक गलतियों के बड़े उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

अफगान युद्ध और दीर्घकालिक प्रभाव

1980 के दशक में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीत युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका के  प्रमुख सहयोगी के रूप में दिखाया। लेकिन इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी, उग्रवाद को बढ़ावा मिला और लंबे समय तक सुरक्षा चुनौतियां बनी रहीं।

वर्तमान समय में, जब कूटनीति का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर दिखाई देता है, पाकिस्तान की रणनीति को “प्रदर्शन आधारित कूटनीति” के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इस तरह की रणनीति अल्पकालिक सुर्खियां बटोर सकती है, लेकिन देश पर दीर्घकालिक प्रभाव और देश की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

भारत के संदर्भ में बढ़ सकती है चुनौती

पाकिस्तान अपनी कथित कूटनीतिक “सफलताओं” से उत्साहित होकर भारत के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है। हालांकि, हाल के वर्षों में भारत की सख्त सुरक्षा नीति  को देखते हुए किसी भी संभावित टकराव के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

पाकिस्तान बार-बार उपस्थिति को प्रभाव और दिखावे को शक्ति समझने की गलती करता रहा है। कूटनीतिक मंचों पर सक्रियता और वास्तविक निर्णय क्षमता के बीच यह अंतर ही उसकी रणनीतिक चुनौतियों की जड़ है।

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