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Tuesday, April 14, 2026
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कैग रिपोर्ट में खुलासा- ‘जम्मू-कश्मीर में 697 झीलों में से 518 झीलें गायब’!

1967 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले इस ऑडिट में पाया गया कि व्यापक अतिक्रमण, शहरी विस्तार और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण 315 झीलें पूरी तरह से गायब हो गई हैं।

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जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। कैग की रिपोर्ट में सामने आया है कि 518 झीलें या तो पूरी तरह से गायब हो गई हैं या इतनी खराब स्थिति में पहुंच गई हैं कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता।

कैग की रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का खुलासा हुआ है, जिसमें सर्वेक्षण की गई 697 झीलों में से 518 झीलें या तो गायब हो गई हैं या खराब स्थिति में पहुंच गई हैं।

1967 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले इस ऑडिट में पाया गया कि व्यापक अतिक्रमण, शहरी विस्तार और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण 315 झीलें पूरी तरह से गायब हो गई हैं।

कैग ने केंद्र शासित प्रदेश में उभरते पारिस्थितिक संकट की ओर ध्यान दिलाया है, जो तत्काल उपाय न किए जाने पर और भी गंभीर हो सकता है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से सात जल निकायों की पहचान की गई है जो सूख चुके हैं, जिनमें राख-ए-अर्थ, सेथरगुंड नुंबल, मरहामा, देवपुरसर, महतान, चंदरगर नुंबल और गलवाल तालाब शामिल हैं, जो पूरी तरह सूखने के बाद ‘अदृश्य’ हो गए हैं।

यह गिरावट काफी हद तक मानव निर्मित है, जो आर्द्रभूमि को कृषि, आवासीय या व्यावसायिक भूमि में परिवर्तित करने के कारण हुई है। रिपोर्ट में डल और वुलर जैसी प्रमुख जल निकायों के संरक्षण कार्यक्रमों की विफलता को उजागर किया गया है, जिसमें अनुपचारित सीवेज और नामित अधिकारियों की अक्षमता को प्रमुख मुद्दों के रूप में बताया गया है।

लुप्त हो चुकी 315 झीलों में से 235 राजस्व और कृषि विभागों की देखरेख में थीं, जबकि 80 का प्रबंधन वन विभाग द्वारा किया जाता था। केवल छह प्रमुख झीलों (डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिंसर और मानसर) पर ही ध्यान दिया गया, जिससे शेष 691 झीलों के लिए कोई उचित प्रबंधन योजना नहीं बन पाई।

कैग की रिपोर्ट में आगे होने वाले नुकसान को रोकने और इन महत्वपूर्ण जल निकायों के पुनर्स्थापन को सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष, एकीकृत प्राधिकरण की सिफारिश की गई है।

इसी से संबंधित एक घटनाक्रम में हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन में कश्मीर हिमालय में स्थित पांच ऊंचाई वाले हिमनदों को हिमनद विस्फोट बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बताया गया है। यह बाढ़ बादल फटने जैसी चरम मौसम घटनाओं से उत्पन्न हो सकती है।

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