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Wednesday, July 1, 2026
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टीबी की देर से पहचान बनी जानलेवा, हर सप्ताह एक मौत: अध्ययन!

यह शोध जर्नल थोरेक्स में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ब्रिटेन में जन्मे और अधिक उम्र के पुरुषों में मृत्यु के बाद टीबी की पहचान हो पाई। 

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इंग्लैंड में टीबी से मौत को लेकर एक नया खुलासा किया गया है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि इंग्लैंड में हर सप्ताह एक व्यक्ति की तपेदिक (टीबी) का समय पर पता न चल पाने के कारण मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में बीमारी का पता केवल मृत्यु के बाद (पोस्टमार्टम के दौरान) चलता है, जिससे मरीज को इलाज का अवसर ही नहीं मिल पाता।

यह शोध जर्नल थोरेक्स में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ब्रिटेन में जन्मे और अधिक उम्र के पुरुषों में मृत्यु के बाद टीबी की पहचान हो पाई। इससे संकेत मिलता है कि स्वास्थ्यकर्मी इन मरीजों में टीबी की आशंका को लेकर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि मृत्यु के बाद टीबी का पता चलना एक “नेवर इवेंट” माना जाना चाहिए, यानी ऐसी घटना जो किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए और जिसकी तत्काल जांच होनी चाहिए। उन्होंने इसे “निदान में सबसे बड़ी देरी” बताया।

इंग्लैंड में टीबी के मामलों की दर पिछले 10 वर्षों में सबसे अधिक हो गई है। वर्ष 2024 में प्रति एक लाख आबादी पर 9.4 मामले दर्ज किए गए, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्धारित “कम संक्रमण वाले देश” की सीमा के बेहद करीब है।

मीडिया आउटलेट द गार्डियन के मुताबिक, आमतौर पर इंग्लैंड में टीबी के अधिकांश मरीज विदेश में जन्मे होते हैं और उनकी औसत आयु 36 वर्ष होती है। लेकिन थोरेक्स जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि मृत्यु के बाद जिन लोगों में टीबी की पहचान हुई, वे ज्यादातर ब्रिटेन में जन्मे और अधिक उम्र के थे।

अध्ययन की सह-लेखिका और लिवरपूल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. एलेनोर मॉर्गन के अनुसार, “जब टीबी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, तब हमें हर मरीज के बारे में यह सवाल पूछते रहना चाहिए ‘क्या यह टीबी हो सकती है?’ भले ही वह सामान्य जोखिम वाले समूह में न आता हो।”

अध्ययन में पाया गया कि मृत्यु के बाद टीबी की पहचान उन लोगों में अधिक हुई जो लंदन के बाहर रहते थे और जिनका शराब या नशीले पदार्थों के सेवन का इतिहास था।

इसके अलावा, चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों में भी जोखिम अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका कारण उनका अपरिपक्व प्रतिरक्षा तंत्र, सामान्य जैसे दिखने वाले लक्षण और छोटे बच्चों से जांच के लिए नमूने लेना कठिन होना हो सकता है।

टीबी आज भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारी बनी हुई है। वर्ष 2024 में लगभग 12.3 लाख लोगों की मौत टीबी से हुई, जबकि 1.07 करोड़ लोग इस बीमारी से संक्रमित हुए।

हालांकि, टीबी रोकथाम योग्य और पूरी तरह इलाज योग्य बीमारी है। विशेष एंटीबायोटिक दवाओं से इसका उपचार संभव है, और हाल के वर्षों में नई दवाओं की मदद से, यहां तक कि दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज की अवधि भी काफी कम हुई है।

अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. टॉम विंगफील्ड ने अपने शोध पत्र में कहा कि जिस तरह एमआरएसए या क्लॉस्ट्रिडियोइड्स डिफिसाइल जैसे सुपरबग से होने वाली मौतों की एनएचएस में नियमित जांच होती है, उसी तरह टीबी से जुड़ी हर मौत की भी गहन जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी मौतों को रोका जा सके।

उन्होंने कहा कि इंग्लैंड में टीबी के बढ़ते मामले चिंता का विषय हैं क्योंकि बीमारी का देर से पता चलने पर मरीज की स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ता है और संक्रमण दूसरों तक फैलने की संभावना भी बढ़ जाती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह घबराने की बात नहीं है, क्योंकि टीबी का सफल इलाज संभव है।

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