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Tuesday, October 20, 2026
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बच्चों पर ‘परफेक्ट बनने’ का दबाव बेहद खतरनाक, ‘पुशी पेरेंटिंग’ मेंटल हेल्थ करता है खराब!

मनोविज्ञान के अनुसार, पुशी पेरेंटिंग का मतलब है बच्चे पर अपनी इच्छाएं थोपना और उसे हमेशा परफेक्ट बनने के लिए मजबूर करना। इसमें देखने में लगता है कि बच्चा अच्छा कर रहा है| 

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आज के समय में हर माता-पिता अपने बच्चे को सबसे बेहतर देखना चाहते हैं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब माता-पिता अपनी इन उम्मीदों को बच्चों पर थोपने लगते हैं और उन्हें ‘परफेक्ट’ बनने के लिए मजबूर करते हैं। इसे साइकोलॉजिकल भाषा में ‘पुशी पेरेंटिंग’ कहा जाता है। यह देखने में बाहर से भले ही अनुशासन और सफलता जैसी दिखे, लेकिन अंदर ही अंदर यह बच्चे के मानसिक विकास के लिए खतरनाक है।

मनोविज्ञान के अनुसार, पुशी पेरेंटिंग का मतलब है बच्चे पर अपनी इच्छाएं थोपना और उसे हमेशा परफेक्ट बनने के लिए मजबूर करना। इसमें देखने में लगता है कि बच्चा अच्छा कर रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर वह तनाव महसूस करता रहता है। बच्चा खेल, सीखने और खुशी से ज्यादा केवल परफॉर्मेंस के बारे में सोचने लगता है।

पुशी पेरेंटिंग में माता-पिता हमेशा बच्चे से सबसे ज्यादा नंबर या हर काम में नंबर वन आने की उम्मीद करते हैं। अगर बच्चा अच्छे नंबर भी ले आए, लेकिन टॉप नहीं कर पाया, तो उसे डांट मिलती है। इससे बच्चे को लगने लगता है कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। धीरे-धीरे उसके अंदर डर पैदा हो जाता है। वह खुद को तभी अपनाता है जब वह दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरता है।

पुशी पेरेंटिंग के दूसरे संकेत में बच्चे की पसंद को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार बच्चे को किसी खेल, कला या शौक में रुचि होती है, लेकिन माता-पिता उसे अपनी मर्जी के करियर या पढ़ाई की तरफ धकेलते हैं। इससे बच्चा अपनी खुशी और रुचि को दबाने लगता है और केवल वही करने की कोशिश करता है जिससे माता-पिता खुश हों।

इसके अलावा, जब बच्चों की तुलना दूसरों से की जाती है, तो यह आदत बच्चे के आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है। वह खुद को दूसरों से कम समझने लगता है और धीरे-धीरे उसके मन में हीन भावना आ सकती है। मनोवैज्ञानिक इसे सेल्फ-डाउट पैटर्न कहते हैं, जिसमें बच्चा खुद पर भरोसा करना छोड़ देता है।

अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता बच्चे के हर छोटे-बड़े फैसले खुद लेने लगते हैं। जैसे क्या पहनना है, क्या खाना है, किससे दोस्ती करनी है या खाली समय में क्या करना है। जब बच्चे को अपने फैसले खुद लेने का मौका नहीं मिलता, तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाता। बड़े होकर भी उसे हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों को दिशा देना जरूरी है, लेकिन उन पर दबाव डालना सही नहीं है।

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