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Thursday, October 29, 2026
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प्रो. शोभिता जैन : ईर्ष्या हो ऐसा चमकदार जीवन…

उनका जाना मन को भीतर तक सुन्न कर देने वाला है। हमने एक अत्यंत महान और सम्माननीय व्यक्तित्व को खो दिया है। वह मेरे आईपीएस मित्र शिरीष जैन की माताजी थीं।

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85 वर्ष की आयु में प्रो. शोभिता जैन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। जन्म और मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है, इससे कोई अछूता नहीं रहा। लेकिन इंसान किस तरह जीता है, यही वह बात है जो एक व्यक्ति के जीवन को दूसरे से अलग बनाती है। जब हम किसी करीबी व्यक्ति को खो देते हैं, तो यह सोचकर मन दुखी होता है कि अब यह व्यक्ति हमें कभी दिखाई नहीं देगा। लेकिन कुछ लोग अपने जीवनकाल में इतना बड़ा काम कर जाते हैं कि उनका कार्य ही उनकी स्थायी पहचान और स्मृति बन जाता है। प्रो. शोभिता जैन के निधन की खबर सुनने के बाद मेरे मन में भी यही विचार आया।
उनका जाना मन को भीतर तक सुन्न कर देने वाला है। हमने एक अत्यंत महान और सम्माननीय व्यक्तित्व को खो दिया है। वह मेरे आईपीएस मित्र शिरीष जैन की माताजी थीं। उनके बारे में मैंने कई बार सुना और पढ़ा था, लेकिन उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला। कॉर्पोरेट और प्रशासनिक क्षेत्र में काम करते हुए हम अक्सर नेतृत्व, संगठन क्षमता और सतत विकास जैसे विषयों पर चर्चा करते हैं; लेकिन प्रो. शोभिता जैन का जीवन और कार्य देखकर समझ आता है कि समाज पर गहरी छाप छोड़ने वाला जीवन और ‘सामाजिक नेतृत्व’ वास्तव में क्या होता है।

जब मैंने उनके जीवन-प्रवास और उपलब्धियों को करीब से देखा, तो सचमुच आश्चर्यचकित रह गया। 1958-60 के दशक में इलाहाबाद और लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक एवं परास्नातक शिक्षा प्राप्त करना, उसके बाद कैनबरा, ऑक्सफोर्ड से होते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक यात्रा करना- यह उस दौर में ही नहीं, बल्कि आज के समय में भी किसी महिला के लिए बेहद असाधारण और प्रेरणादायी उपलब्धि है।

इग्नू (IGNOU) में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दूरस्थ शिक्षा की नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश के दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए उन्होंने स्वयं उन इलाकों में जाकर कार्यशालाएं आयोजित कीं। आज की कॉर्पोरेट भाषा में कहें तो उन्होंने शिक्षा की ‘लास्ट-माइल डिलीवरी’ व्यवस्था को बेहद सफलतापूर्वक लागू किया।

असम के चाय बागानों में काम करने वाली महिला श्रमिकों पर उनका शोध हो, मलेशिया के रबर बागानों पर किया गया अध्ययन हो या चिपको आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर उनका प्रसिद्ध लेख- उनका ध्यान हमेशा जमीन से जुड़े वास्तविक सामाजिक मुद्दों और परिवर्तन पर केंद्रित रहा। FAO और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी उनके अनुभव और सलाह का लाभ उठाया। यही उनके ज्ञान और विशेषज्ञता की ताकत को दर्शाता है।

ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान परिवार संभालना, बच्चों का पालन-पोषण करना, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शोध कार्य करना और अंततः IGNOU के ‘स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज’ की निदेशक की जिम्मेदारी संभालना- उनकी जीवन यात्रा वास्तव में अद्भुत है।

उन्होंने केवल अपना करियर ही नहीं बनाया, बल्कि परिवार को भी उतना ही समय और योगदान दिया। बच्चों को अच्छे संस्कार दिए और उनके जीवन को दिशा दी। उन्होंने करियर और परिवार, दोनों को समान महत्व दिया। इन दोनों के बीच उन्होंने जिस संतुलन का परिचय दिया, वह बेहद प्रशंसनीय है और आज की महिलाओं के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण भी है।

प्रो. शोभिता जैन ने अपने 85 वर्षों के जीवन में शैक्षणिक, सामाजिक और वैचारिक क्षेत्रों में जो योगदान दिया, वह आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा। ऐसी अत्यंत समर्पित, विद्वान, अध्ययनशील और दूरदर्शी महान विदुषी को मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

 
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