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Wednesday, June 10, 2026
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किशोरावस्था: जीवन का सबसे अहम पड़ाव, सही मार्गदर्शन से ही बनता है स्वस्थ भविष्य!

आयुष मंत्रालय ने बताया कि किशोरावस्था में बच्चों के मूड में जल्दी-जल्दी बदलाव आता है और कभी-कभी उनका आत्मविश्वास भी कम-ज्यादा होता रहता है।

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किशोरावस्था वह समय होता है जब बच्चा धीरे-धीरे वयस्क बनने की ओर बढ़ता है। यह अवस्था लगभग 10 से 19 साल की उम्र के बीच होती है। इस दौरान शरीर में कई तरह के शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं, जिसे यौवनावस्था कहते हैं। लड़के और लड़कियों दोनों के शरीर में बदलाव होने लगते हैं, जैसे कद बढ़ना, आवाज बदलना, शरीर के आकार में परिवर्तन आदि। इस समय बच्चे बहुत संवेदनशील हो जाते हैं।

आयुष मंत्रालय ने बताया कि किशोरावस्था में बच्चों के मूड में जल्दी-जल्दी बदलाव आता है और कभी-कभी उनका आत्मविश्वास भी कम-ज्यादा होता रहता है। अगर इस समय सही मार्गदर्शन और समझ न मिले तो वे गलत निर्णय ले सकते हैं। कई बार वे गलत संगत, नशा या साथियों के दबाव में आकर गलत रास्ते पर चल सकते हैं। इसलिए इस उम्र में सही सलाह और काउंसलिंग बहुत जरूरी होती है ताकि वे अपनी भावनाओं को सही तरीके से समझ सकें और सही दिशा में आगे बढ़ सकें।

हर बच्चे पर जीवन की परिस्थितियों का अलग-अलग असर पड़ता है। कुछ घटनाएं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं, जैसे भाई-बहन का जन्म होना, किसी प्रियजन या पालतू जानवर की मृत्यु, शारीरिक या मानसिक शोषण, गरीबी या बेघर होना, प्राकृतिक आपदा, घर में हिंसा, नए स्थान पर जाना या नया स्कूल शुरू करना, स्कूल में बुली होना, उम्र से ज्यादा जिम्मेदारियां लेना या माता-पिता का अलग होना।

किशोर लड़कियों को कुछ अतिरिक्त समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है, जैसे मासिक धर्म से जुड़ी दिक्कतें, भेदभाव, यौन अपराध, संक्रमण या अनचाहा गर्भ। आजकल किशोरों में शारीरिक गतिविधि की कमी, कुपोषण, मोटापा, तंबाकू और नशे की आदतें तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आम हैं। इनसे बचाव के लिए सही मार्गदर्शन और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी है।

माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। उन्हें बच्चों में अच्छी आदतें डालनी चाहिए जैसे दिनचर्या, ऋतुचर्या, अच्छा व्यवहार और सही खान-पान। बच्चों को योग, खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के लिए एक अच्छा उदाहरण बनना चाहिए, उनकी बातों को धैर्य से सुनना चाहिए और उन्हें पर्याप्त समय देना चाहिए।

बच्चों पर बहुत ज्यादा रोकटोक या आलोचना नहीं करनी चाहिए। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना और उनकी अच्छी बातों की सराहना करना चाहिए। उन्हें समझाने के बजाय प्यार से मार्गदर्शन देना चाहिए और उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

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